August 18, 2026

DGP ने पुलिस को दिए नए निर्देश, बयान दर्ज करने से लेकर पासपोर्ट सत्यापन तक बदले नियम

लखनऊ: आपराधिक मामलों की विवेचना और जांच के दौरान अब उत्तर प्रदेश पुलिस के विवेचक गवाहों के बयानों में अपनी तरफ से कोई भी शब्द या फेरबदल नहीं कर सकेंगे। इस संबंध में राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव कृष्णा ने प्रदेश के सभी पुलिस कमिश्नरों, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों (SSP), पुलिस अधीक्षकों (SP) और थाना प्रभारियों को कड़े निर्देश जारी कर दिए हैं। नए नियमों के मुताबिक, गवाह अपनी जिस स्थानीय बोली और भाषा में घटना का विवरण देंगे, जांच अधिकारी को उनके बयानों को बिल्कुल उसी मूल रूप में ही लिपिबद्ध करना होगा। इसके अलावा, किसी भी अभियुक्त के विरुद्ध जबरन आरोप गढ़ने या उसे दोषी साबित करने वाले पूर्वाग्रह से ग्रसित सवाल नहीं पूछे जा सकेंगे। यदि इन नियमों की अनदेखी या उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित विवेचक के साथ-साथ पर्यवेक्षण अधिकारी (Supervisory Officer) के खिलाफ भी सख्त विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

यह तमाम निर्देश इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) द्वारा बीते 30 जुलाई 2026 को दिए गए एक महत्वपूर्ण आदेश के अनुपालन में जारी किए गए हैं। अदालत ने 'आतिश उर्फ कृष्णकांत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले की सुनवाई के दौरान यह पाया था कि पीड़ित और उसकी पत्नी के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डेड बयानों और पुलिस द्वारा दर्ज किए गए बयानों में जमीन-आसमान का अंतर था। विवेचक ने गवाहों के वास्तविक कथनों के स्थान पर अपनी ओर से तथ्य जोड़ दिए थे, जिसे हाईकोर्ट ने बेहद अनुचित करार देते हुए डीजीपी को इस पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने का निर्देश दिया था। डीजीपी ने थानों के सभी विवेचकों और पुलिसकर्मियों के लिए विशेष कार्यशालाएं आयोजित करने के भी निर्देश दिए हैं, जिनमें उन्हें नए आपराधिक कानूनों और बयान दर्ज करने की सही कानूनी प्रक्रिया का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

केवल स्पष्टीकरण के लिए ही सवाल पूछ सकेगा विवेचक

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 180 के प्रावधानों के तहत अब विवेचक गवाहों से सूचक (Leading) सवाल नहीं पूछ सकेंगे। इस तरह के सवालों का उद्देश्य किसी आरोपी के खिलाफ जबरन कोई तथ्य निकलवाना या अभियोजन पक्ष के आरोपों को मजबूत करना नहीं होगा। हालांकि, यदि किसी बात पर अस्पष्टता है, तो केवल उस बिंदु को स्पष्ट करने के लिए ही नियमानुसार सवाल पूछे जा सकते हैं, लेकिन गवाह को किसी भी प्रकार के उत्तर का सुझाव या इशारा नहीं दिया जाएगा। गवाह जिस भाषा या लहजे में घटना बताएगा, बयान उसी प्रामाणिक रूप में दर्ज किया जाएगा।

7 वर्ष या उससे अधिक सजा वाले मामलों में फॉरेंसिक जांच अनिवार्य

डीजीपी ने आपराधिक विवेचनाओं में डिजिटल साक्ष्यों के अधिकाधिक और पारदर्शी इस्तेमाल पर भी विशेष जोर दिया है। किसी भी प्रकार की तलाशी, जब्ती, घटनास्थल के निरीक्षण और अन्य कानूनी कार्रवाई के दौरान जुटाए गए डिजिटल साक्ष्यों को अनिवार्य रूप से 'ई-साक्ष्य ऐप' पर अपलोड करना होगा। आवश्यकतानुसार इन्हें संबंधित प्राथमिकी (FIR) से लिंक करने के भी सख्त निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही, जिन मामलों में सात वर्ष या उससे अधिक कारावास की सजा का प्रावधान है, उन गंभीर अपराधों में घटनास्थल का फॉरेंसिक विशेषज्ञों (Forensic Experts) द्वारा निरीक्षण करना पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया है। ऐसे मामलों में घटनास्थल की उच्च गुणवत्ता वाली फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करवाना भी अब जरूरी होगा।

पासपोर्ट सत्यापन में आपराधिक इतिहास छिपाने वाले पुलिसकर्मी नपेंगे

पासपोर्ट सत्यापन (Passport Verification) की प्रक्रिया के दौरान आवेदक के खिलाफ दर्ज पुराने या नए आपराधिक मुकदमों की जानकारी छिपाना अथवा गलत और अधूरी रिपोर्ट भेजना अब संबंधित पुलिसकर्मियों को काफी भारी पड़ेगा। हाईकोर्ट की कड़ी फटकार और सख्ती के बाद डीजीपी राजीव कृष्णा ने इस संबंध में भी विस्तृत आदेश जारी किए हैं। इसके तहत पासपोर्ट सत्यापन की रिपोर्ट पूरी, तथ्यात्मक और सही जानकारियों के साथ ही पोर्टल पर प्रेषित करने के निर्देश दिए गए हैं। यदि सत्यापन रिपोर्ट में किसी भी प्रकार की लापरवाही या मिलीभगत पाई जाती है, तो रिपोर्ट भेजने वाले पुलिसकर्मी के साथ-साथ मामले के लिए जिम्मेदार अन्य अधिकारियों पर भी गाज गिरेगी।

अब पासपोर्ट सेवा पोर्टल पर रिपोर्ट अपलोड करते समय आवेदक के विरुद्ध दर्ज सभी छोटे-बड़े मुकदमों और उनकी अद्यतन (Current) स्थिति का पूरा ब्योरा देना अनिवार्य होगा। यदि थाने के आधिकारिक रिकॉर्ड में कोई आपराधिक मामला दर्ज है और उसे पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में नहीं दर्शाया जाता है, तो संबंधित पुलिसकर्मी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। यह निर्देश 'जतिन कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य' मामले में आए उच्च न्यायालय के आदेश के बाद जारी किए गए हैं। सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में यह बात आई थी कि पुलिस ने 15 जून 2026 को क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय को भेजी गई रिपोर्ट में आवेदक के खिलाफ केवल एक ही मुकदमा दर्ज होना बताया था, जबकि वर्ष 2024 में उसके खिलाफ एक और अन्य मामला भी दर्ज था, जिसे पुलिस ने जानबूझकर या लापरवाहीवश सत्यापन रिपोर्ट में छिपा लिया था। हाईकोर्ट ने पुलिस की इस गंभीर चूक पर गहरी नाराजगी व्यक्त की थी, जिसके बाद यह सख्त कदम उठाया गया है।