November 4, 2026

अनिरुद्ध मुखर्जी के खिलाफ FIR की मांग, MPPCB अध्यक्ष पद पर रहने को लेकर विवाद

भोपाल। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) के शीर्ष प्रशासनिक पद पर नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक नया और बड़ा प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। वर्ष 1993 बैच के वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी अनिरुद्ध मुखर्जी पर बिना किसी वैधानिक आदेश के लगभग पांच महीने तक बोर्ड के अध्यक्ष पद का प्रभार संभालने का गंभीर आरोप लगा है। इस मामले में पर्यावरण एवं वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री, कैबिनेट सचिव और प्रदेश के मुख्य सचिव को एक ज्ञापन प्रेषित कर वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने, गिरफ्तारी, निलंबन तथा पूरे मामले की लोकायुक्त जांच कराने की पुरजोर मांग उठाई है। शिकायत में स्पष्ट किया गया है कि सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी आदेश में उन्हें केवल पर्यावरण विभाग एवं ईपीसीओ से संबंधित दायित्व सौंपे गए थे, किंतु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष पद का कोई प्रभार नहीं दिया गया था, इसके बावजूद उन्होंने 6 जुलाई 2026 को स्वयं को बोर्ड का अध्यक्ष घोषित कर दिया।

मुख्यमंत्री द्वारा प्रस्ताव खारिज करने के बावजूद पद संभालने का आरोप

पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे द्वारा सौंपे गए ज्ञापन के अनुसार, सामान्य प्रशासन विभाग ने 17 जून 2026 को आदेश जारी कर अनिरुद्ध मुखर्जी को अपर मुख्य सचिव (पर्यावरण), पर्यावरण आयुक्त तथा ईपीसीओ के महानिदेशक का अतिरिक्त प्रभार सौंपा था। इस आधिकारिक आदेश में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष पद का कहीं भी कोई उल्लेख नहीं था। ज्ञापन में दावा किया गया है कि इसके बाद 6 जुलाई 2026 को आईएएस अधिकारी ने स्वयं को बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त करने के संबंध में एक प्रस्ताव मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत किया था, जिसे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तय नियमों और प्रक्रियाओं के अनुरूप न पाकर पूरी तरह निरस्त कर दिया था। आरोप है कि इस प्रस्ताव के खारिज होने के बाद भी अधिकारी अवैध रूप से बोर्ड के अध्यक्ष पद पर बने रहे और दायित्वों का निर्वहन करते रहे।

वैधानिक प्रक्रिया, सर्च कमेटी और राजपत्र अधिसूचना के उल्लंघन का मुद्दा

शिकायत पत्र में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 4(2) के विधिक प्रावधानों का स्पष्ट हवाला देते हुए कहा गया है कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष की नियुक्ति एक निश्चित वैधानिक प्रक्रिया के तहत ही की जा सकती है। इसके लिए नियमनुसार सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटी का गठन और तत्पश्चात शासकीय राजपत्र (गजट) में अधिसूचना जारी करना अनिवार्य होता है। अजय दुबे ने आरोप लगाया है कि इन समस्त अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन किए बिना अध्यक्ष पद पर आसीन होकर शासकीय कार्य संपादित करना नियमों, अधिनियमों और प्रशासनिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन है।

पांच महीने में लिए गए फैसलों की निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग

इस कथित अनधिकृत कार्यकाल के दौरान लिए गए बड़े प्रशासनिक और नीतिगत निर्णयों पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े किए गए हैं। ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि बिना वैधानिक नियुक्ति के इस अवधि में कई औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरणीय स्वीकृतियां, सम्मतियां और अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किए गए, साथ ही पदोन्नति एवं तबादलों जैसे कई दूरगामी फैसले भी लिए गए। अजय दुबे ने इस पांच महीने की अवधि में जारी किए गए सभी आदेशों, स्वीकृतियों और वित्तीय लेन-देन की लोकायुक्त से स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने संबंधित अधिकारी के विरुद्ध धोखाधड़ी, कूटरचित आचरण और पद के दुरुपयोग के आरोपों में मामला दर्ज कर गिरफ्तारी करने, उन्हें तत्काल निलंबित कर सेवा से बर्खास्त करने तथा इस दौरान लिए गए सभी निर्णयों की वैधानिक समीक्षा करने की मांग उठाई है।