CBSE के नए मूल्यांकन सिस्टम पर सवाल, दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

नई दिल्ली। देश के लाखों विद्यार्थियों के भविष्य और उच्च शिक्षा से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और केंद्र सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। दरअसल, बोर्ड द्वारा लागू की गई नई ऑनस्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली में गंभीर तकनीकी गड़बड़ियों के आरोप लगे हैं, जिसकी वजह से कई होनहार छात्रों के परीक्षा परिणाम और अंकों पर बेहद विपरीत असर पड़ा है। आशंका जताई जा रही है कि इस तकनीकी चूक के कारण विद्यार्थियों के आगामी कॉलेज दाखिले और करियर के रास्ते बंद हो सकते हैं। न्यायालय की अवकाशकालीन पीठ के न्यायाधीशों ने इस पूरे प्रकरण पर संज्ञान लेते हुए संबंधित पक्षों से विस्तृत जवाब तलब किया है।

डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली पर उठे सवाल और कॉपियों के पन्ने गायब होने का दावा

यह पूरी अदालती कार्रवाई नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका (PIL) के आधार पर शुरू हुई है। याचिका में डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली (डिजिटल इवैल्यूएशन) की कार्यप्रणाली पर गंभीर उंगलियां उठाई गई हैं। दलील दी गई है कि इस नई व्यवस्था के तहत मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं (आंसर शीट्स) के जो स्कैन किए गए थे, वे बेहद धुंधले और अस्पष्ट थे। इतना ही नहीं, कॉपियों के कई महत्वपूर्ण पन्ने सिस्टम से पूरी तरह गायब पाए गए और छात्रों द्वारा लिखे गए कुछ सही उत्तर सॉफ्टवेयर पर सही ढंग से अपलोड ही नहीं हो सके। इसी तकनीकी खामी का नतीजा है कि परीक्षा में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले छात्रों को भी उनकी अपेक्षा से बेहद कम अंक प्राप्त हुए हैं।

शिक्षा के राजनीतिकरण का आरोप और सीबीएसई की तीखी आपत्ति

चूंकि 12वीं कक्षा के अंक ही देश के तमाम प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों (प्रोफेशनल कोर्सेज) में मेरिट का मुख्य आधार होते हैं, इसलिए इस तकनीकी चूक का सीधा नुकसान निर्दोष विद्यार्थियों को उठाना पड़ रहा है। अदालत में सुनवाई के दौरान सीबीएसई के वकीलों ने इस जनहित याचिका की वैधानिकता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए। बोर्ड का मुख्य तर्क था कि यह याचिका सीधे तौर पर एक राजनीतिक दल के छात्र संगठन द्वारा दायर की गई है, जिसका उद्देश्य जनहित कम और राजनीति चमकाना ज्यादा है। बोर्ड ने अदालत के समक्ष कहा कि वे शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र का इस तरह राजनीतिकरण किए जाने के सख्त खिलाफ हैं। इसके साथ ही सीबीएसई ने दावा किया कि जिन भी छात्रों को परिणाम को लेकर व्यक्तिगत शिकायतें थीं, बोर्ड स्तर पर उनका त्वरित समाधान किया जा रहा है।

छात्र संगठन का बचाव और निष्पक्ष जांच के लिए अदालत का रुख

सीबीएसई के इन आरोपों का खंडन करते हुए याचिकाकर्ता के कानूनी प्रतिनिधि ने अदालत में मजबूत पैरवी की। उन्होंने तर्क दिया कि देश के हजारों छात्रों और उनके परेशान अभिभावकों से लगातार मिल रही शिकायतें साफ तौर पर यह साबित करती हैं कि यह किसी एक छात्र की व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की एक व्यापक और गंभीर विफलता है। छात्र संगठन के अध्यक्ष के माध्यम से दायर इस याचिका में स्पष्ट किया गया कि किसी संगठन की राजनीतिक संबद्धता होने मात्र से छात्रों के अधिकारों की आवाज उठाने की उसकी योग्यता पर कोई कानूनी फर्क नहीं पड़ता। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बिना किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचे, आगामी 12 जून को अगली विस्तृत सुनवाई की तारीख मुकर्रर की है। इस याचिका में पूरे ऑनस्क्रीन मार्किंग घोटाले की किसी स्वतंत्र और उच्च स्तरीय एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराने की पुरजोर मांग की गई है।