November 3, 2026

गैर-RAS अधिकारियों की पदोन्नति पर अदालत का दखल, सरकार को 15 दिन में निर्णय लेने को कहा

जयपुर। गैर-आरएएस अधिकारियों को भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के प्रतिष्ठित पदों पर पदोन्नति देने से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने सरकार को यह आदेश दिया है कि वह आगामी पंद्रह दिनों के भीतर इस विषय पर अपना अंतिम निर्णय ले। न्यायमूर्ति अनूप ढंढ की एकलपीठ ने सुरेश कुमार वर्मा, श्यामसुंदर ज्यानी, कार्तिकेय मिश्रा तथा नर्बदा इंदौरिया द्वारा दायर की गई संयुक्त याचिका का निस्तारण करते हुए यह फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के पश्चात निर्धारित समय सीमा के भीतर एक स्पष्ट और कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए, हालांकि कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि वह सरकार को किसी विशेष पक्ष में निर्णय लेने के लिए बाध्य नहीं कर रहा है तथा सरकार प्रचलित कानूनी प्रावधानों के अनुसार निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

चार रिक्तियों के विरुद्ध शुरू हुई थी चयन और साक्षात्कार प्रक्रिया

अदालत में याचिकाकर्ताओं की पैरवी कर रहे अधिवक्ता राजीव सोगरवाल ने पूरे मामले का विस्तृत विवरण रखते हुए बताया कि वर्ष 2024 की चार रिक्तियों के संदर्भ में वर्ष 2025 के दौरान गैर-आरएएस अधिकारियों को आईएएस संवर्ग में पदोन्नत करने की आधिकारिक प्रक्रिया का आगाज किया गया था। इस प्रक्रिया के अंतर्गत विभिन्न राज्य सेवाओं से जुड़े बीस योग्य अधिकारियों को संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के चयन बोर्ड के समक्ष साक्षात्कार के लिए आमंत्रित किया गया था। गत वर्ष दिसंबर माह में संपन्न हुए इन साक्षात्कारों के पश्चात आयोग ने बीस में से चार सर्वश्रेष्ठ अधिकारियों का चयन कर लिया था। इसके उपरांत, चयनित अधिकारियों के नामों की अनुशंसा से संबंधित फाइल आगे की टिप्पणियों के लिए राज्य सरकार के पास भेजी गई थी, परंतु राज्य प्रशासन की ओर से इस मामले में आगे कोई विधिवत कार्रवाई नहीं की गई।

नियमों के तहत तय समय सीमा और फाइल रोके जाने का आरोप

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के संज्ञान में लाया गया कि अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु-सह-निवृत्ति लाभ / पदोन्नति) नियमावली, 1997 के नियम छह के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार राज्य सरकार को अपनी टिप्पणियां पैंतालीस दिनों की अवधि के भीतर संघ लोक सेवा आयोग को प्रेषित करनी होती हैं। इसके बावजूद, कई महीनों का लंबा समय बीत जाने के बाद भी सरकार द्वारा इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया। याचिका में यह गंभीर आरोप भी लगाया गया कि राज्य सरकार पिछले लगभग दस महीनों से बिना किसी ठोस कारण के संबंधित फाइल को अपने पास रोके हुए है। चयन की प्रक्रिया पूरी होने और चार योग्य अधिकारियों के नाम तय होने के बावजूद सरकारी स्तर पर टिप्पणियां न भेजे जाने के कारण उनकी पदोन्नति की पत्रावली पूरी तरह से अटक गई थी, जिससे व्यथित होकर अधिकारियों को उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।

उच्च न्यायालय द्वारा तय समय सीमा और कानूनी स्वतंत्रता

मामले की सभी पक्षों से गंभीरतापूर्वक सुनवाई करने के बाद उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को पंद्रह दिन की निश्चित समय सीमा के भीतर उचित निर्णय लेने का आदेश दिया है। अदालत ने अपने आदेश में यह बात बेहद स्पष्ट की है कि उसका यह निर्देश राज्य सरकार को किसी विशेष पक्ष में फैसला देने के लिए किसी भी रूप में बाध्यकारी नहीं है, बल्कि सरकार स्थापित नियमों और कानूनी प्रावधानों के दायरे में रहकर निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। याचिकाकर्ताओं के वकीलों द्वारा मामले के शीघ्र निस्तारण का अनुरोध किए जाने पर अदालत ने यह समय सीमा निर्धारित की है। अब इस आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के पश्चात राज्य सरकार को निर्धारित पंद्रह दिनों के भीतर इस प्रकरण में एक स्पष्ट कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।