कोलकाता। निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अपनी आगामी कोलकाता यात्रा से पूर्व वामपंथी नेताओं के तीखे हमलों का जवाब देते हुए उन पर पाखंड का आरोप लगाया है। लगभग 19 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद शहर में वापसी कर रहीं तस्लीमा ने स्पष्ट किया है कि उनकी यह यात्रा पूरी तरह से एक धर्मनिरपेक्ष मिशन के निमंत्रण पर आधारित है, जिसका नेतृत्व उस्मान गनी मलिक कर रहे हैं। उन्होंने वामपंथी नेताओं द्वारा उन पर भाजपा, आरएसएस या हिंदुत्व समर्थक होने का लेबल लगाने को एक झूठा दुष्प्रचार करार दिया है। तस्लीमा का कहना है कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य सरकार का एक सामान्य प्रशासनिक कर्तव्य है, न कि किसी राजनीतिक दल का समर्थन।
वामपंथी नेताओं के दोहरे रवैये पर सवाल
तस्लीमा नसरीन ने वामपंथी दलों के कथित दोहरे चरित्र को उजागर करते हुए अपने पिछले केरल दौरों का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने सीपीआई (एम) शासित केरल की यात्रा की थी, तब उन्हें जेड प्लस सुरक्षा के साथ सम्मानित किया गया था। लेखिका ने प्रश्न किया कि क्या उस समय इन वामपंथी नेताओं ने उन पर कोई आरोप लगाया था, या वे तब उनकी यात्रा का समर्थन कर रहे थे। तस्लीमा ने आरोप लगाया कि वामपंथी नेता इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों पर अक्सर चुप्पी साध लेते हैं, जबकि प्रगतिवाद का मुखौटा ओढ़े रहते हैं।
राजनीतिक निष्कासन और संघर्ष का इतिहास
अपनी आत्मकथा 'द्विखंडिता' को लेकर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए लेखिका ने याद दिलाया कि नवंबर 2007 में वाम मोर्चा सरकार ने ही उन्हें शहर छोड़ने का निर्देश दिया था, जिसके बाद सेना तक को तैनात करना पड़ा था। तस्लीमा ने दुख व्यक्त किया कि उनके बाद की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने भी राज्य में उनके प्रवेश पर रोक लगाई, उनके टेलीविजन धारावाहिकों को प्रसारित होने से रोका और उनकी पुस्तकों के विमोचन में बाधाएं उत्पन्न कीं। लेखिका के अनुसार, उनके निष्कासन का एक लंबा राजनीतिक इतिहास रहा है और उन्हें किसी खास दल के साथ जोड़कर देखना बेबुनियाद है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम कट्टरपंथ
तस्लीमा नसरीन ने सोशल मीडिया के माध्यम से वामपंथी नेताओं को खुली चुनौती दी है कि वे कब तक 'जिहादियों की भाषा' बोलते हुए स्वयं को प्रगतिशील बताते रहेंगे। उन्होंने कहा कि उनके लिए यह यात्रा लगभग 18 साल, आठ महीने और 10 दिन बाद घर वापसी जैसा अहसास है। लेखिका ने स्पष्ट किया कि उन्हें किसी राजनीतिक दल की मदद की आवश्यकता नहीं है, वे केवल अपने साहित्यिक और वैचारिक कार्यों के प्रति समर्पित हैं। उनके इस बयान ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय बहस छेड़ दी है जब राज्य में भाजपा और तृणमूल के बीच राजनीतिक सक्रियता चरम पर है।

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