नई दिल्ली। वर्तमान समय में उभरती हुई आधुनिक तकनीकों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डीपफेक और डिजिटल कॉपीराइट से जुड़े नए और जटिल कानूनी मुद्दों पर न्यायपालिका को देश के संविधान के मूल सिद्धांतों एवं आदर्शों के आधार पर ही अपने निर्णय देने होंगे। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने शुक्रवार को एक गरिमामयी समारोह को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट किया कि जब कभी देश के प्रचलित कानूनों की किताबों में किसी नए तकनीकी सवाल का सीधा और स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, तब ऐसी स्थिति में हमारा संविधान ही न्यायपालिका का एकमात्र और सबसे बड़ा मार्गदर्शक बनना चाहिए। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि भले ही विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में तीव्र गति से बदलाव आ रहे हों, परंतु हमारे संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए मानवीय गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के पावन वादे और अधिकार कभी नहीं बदलते।
AI और डीपफेक तकनीक से उत्पन्न चुनौतियां तथा संवैधानिक मार्गदर्शन
राष्ट्रीय राजधानी स्थित दिल्ली उच्च न्यायालय के स्थापना के साठ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित इस विशेष स्वर्ण जयंती समारोह में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आज देश की न्याय व्यवस्था के समक्ष ऐसे अनूठे कानूनी प्रश्न खड़े हो रहे हैं जिनकी कल्पना आज से एक दशक पूर्व करना भी बेहद कठिन था। इन आधुनिक चुनौतियों में मुख्य रूप से यह सवाल शामिल है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI द्वारा तैयार की गई किसी भी सामग्री को कॉपीराइट की सुरक्षा मिलनी चाहिए या नहीं, इंटरनेट पर तेजी से फैल रहे डीपफेक वीडियो और फर्जी सामग्री से निपटने के लिए कानूनी तंत्र को क्या सख्त कदम उठाने चाहिए, तथा तकनीकी विकास और नवाचार को बढ़ावा देते हुए आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित की जाए। CJI ने जोर देकर कहा कि इन तमाम जटिल प्रश्नों के उत्तर अक्सर पुराने कानूनों में सीधे तौर पर नहीं मिलेंगे, इसलिए न्यायपालिका को सही दिशा दिखाने का काम केवल हमारा संविधान ही कर सकता है। उन्होंने यह भी परामर्श दिया कि दिल्ली उच्च न्यायालय को बदलती हुई दुनिया की इन तमाम चुनौतियों का हमेशा खुले दिमाग से मुकाबला करना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही न्याय व्यवस्था का सर्वोपरि उद्देश्य हमेशा उस पीड़ित या सामान्य व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना होना चाहिए जिसके न्याय पाने के लिए ही अदालतें अस्तित्व में आई हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय का गौरवशाली सफर और सुप्रीम कोर्ट से उसका संबंध
अपने संबोधन के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने देश के सर्वोच्च न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय के बीच के अनूठे और प्रगाढ़ संबंधों का भी विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दोनों अदालतों के बीच का यह गहरा रिश्ता केवल उनके भौगोलिक रूप से पास होने की वजह से नहीं है, बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली उच्च न्यायालय देश की सर्वोच्च अदालत के मुकदमों के भारी बोझ को काफी हद तक कम करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। उन्होंने यह भी साझा किया कि कई बार जब सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाएं आती हैं, तो न्यायपीठ वकीलों को यह याद दिलाती है कि दिल्ली उच्च न्यायालय उनके समीप ही स्थित है और वे वहां से भी अपनी न्यायसंगत राहत प्राप्त कर सकते हैं, जिससे कई मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने से पहले ही स्थानीय स्तर पर ही सफलतापूर्वक सुलझ जाते हैं।
चार जजों से शुरू होकर एक विशाल संस्था बनने तक का सफर
इतिहास को याद करते हुए CJI सूर्यकांत ने बताया कि वर्ष 1966 में जब दिल्ली उच्च न्यायालय की स्थापना की गई थी, तब यह केवल एक नए महानगर की बुनियादी जरूरत पूरी करने वाली सामान्य अदालत नहीं थी, बल्कि इसे देश की राजनीतिक, विधिक और प्रशासनिक गतिविधियों के केंद्र में स्थापित किया गया था। शुरुआती दौर में इस उच्च न्यायालय की शुरुआत मात्र चार न्यायाधीशों के साथ हुई थी, लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे दिल्ली का भौगोलिक विस्तार हुआ, व्यापार और वाणिज्य बढ़ा तथा देश के कोने-कोने से आकर लाखों लोग यहां बसे, वैसे-वैसे मुकदमों, वकीलों और याचिकाकर्ताओं की संख्या में भी भारी वृद्धि दर्ज की गई। आज यही चार जजों से शुरू हुई संस्था देश के सबसे प्रमुख और बड़े उच्च न्यायालयों में शुमार हो चुकी है जो हर दिन अनगिनत जटिल दीवानी, आपराधिक और व्यावसायिक मुकदमों का प्रभावी ढंग से निपटारा कर रही है। मुख्य न्यायाधीश ने विशेष रूप से यह भी रेखांकित किया कि इस अदालत ने देश में सिविल और कमर्शियल कानून के विकास में बेहद अहम योगदान दिया है, और यह इस बात का प्रमाण है कि वर्ष 2009 में इसी अदालत ने देश का पहला उच्च न्यायालय से जुड़ा हुआ मध्यस्थता केंद्र स्थापित कर एक ऐतिहासिक पहल की थी।

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