आज के दौर में गठिया (आर्थराइटिस) की समस्या बेहद आम हो चुकी है। पहले जहाँ इसे केवल ढलती उम्र या बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, वहीं अब खराब जीवनशैली और शारीरिक निष्क्रियता के कारण युवा भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं। इस बीमारी के चलते मरीजों को जोड़ों में असहनीय दर्द, सूजन और जकड़न का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका उठना-बैठना और चलना-फिरना तक दूभर हो जाता है।
आमतौर पर गठिया का नाम आते ही पैरों और घुटनों के दर्द की तस्वीर सामने आती है, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि गठिया का एक विशेष प्रकार— जिसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस (RA) कहा जाता है— आपकी आंखों और फेफड़ों के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि जोड़ों की यह बीमारी शरीर के इन नाजुक अंगों को कैसे अपनी चपेट में लेती है।
क्या है रूमेटॉइड आर्थराइटिस (RA)?
यह सामान्य गठिया से काफी अलग है। रूमेटॉइड आर्थराइटिस मूल रूप से एक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर (Autoimmune Disorder) है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) भ्रमित होकर अपनी ही स्वस्थ कोशिकाओं और टिश्यूज को दुश्मन मानकर उन पर हमला करने लगती है, तब यह बीमारी पैदा होती है।
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इसके शुरुआती लक्षणों में हाथों की उंगलियों, कलाई और घुटनों में लगातार दर्द व सूजन बनी रहती है।
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यदि सही समय पर इसकी पहचान कर इलाज शुरू न किया जाए, तो शरीर में पनपने वाली यह सूजन धीरे-धीरे रक्त वाहिकाओं के जरिए अन्य अंगों में फैल जाती है।
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लंबे समय में यह विकार आंखों, श्वसन तंत्र (फेफड़ों), हृदय और तंत्रिका तंत्र को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
आंखों पर अटैक: 90% मरीजों में 'ड्राई आई' का खतरा
हेल्थ रिपोर्ट्स के अनुसार, रूमेटॉइड आर्थराइटिस के कारण पूरे शरीर में अंदरूनी सूजन (इंफ्लेमेशन) लगातार बनी रहती है। यही सूजन आंखों की बारीक नसों और कोशिकाओं को प्रभावित करती है।
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ड्राई आई सिंड्रोम: इस बीमारी से पीड़ित लगभग 90 फीसदी मरीजों में आंखों के सूखेपन (ड्राई आई) की समस्या देखी जाती है, जिससे आंखों में लगातार जलन, खुजली, पानी आना और लालिमा बनी रहती है।
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गंभीर क्षति: यह स्थिति आंखों के सफेद हिस्से (स्क्लेरा) और कॉर्निया को भी स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त कर सकती है, जिससे दृष्टि धुंधली होने का जोखिम बढ़ जाता है।
फेफड़ों को कैसे खोखला करती है यह बीमारी?
जोड़ों की क्रॉनिक सूजन श्वसन तंत्र को भी गंभीर रूप से बीमार कर देती है। रूमेटॉइड आर्थराइटिस के मरीजों में फेफड़ों से जुड़ी निम्नलिखित जटिलताएं काफी आम पाई गई हैं:
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पल्मोनरी नोड्यूल्स: फेफड़ों के भीतर छोटी-छोटी गांठें बन जाना।
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प्लूरल इफ्यूजन: फेफड़ों और छाती की अंदरूनी दीवार के बीच असामान्य रूप से तरल पदार्थ (पानी) का जमा हो जाना, जिससे सांस लेने में भारी तकलीफ होती है।
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ब्रोंकिएक्टेसिस: सांस ले जाने वाली नलियों का स्थायी रूप से चौड़ा और क्षतिग्रस्त हो जाना, जिससे बलगम साफ होने में दिक्कत आती है।
यही कारण है कि रूमेटॉजिस्ट इस बीमारी से पीड़ित मरीजों को समय-समय पर फेफड़ों का एक्स-रे या पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (PFT) कराने की सख्त सलाह देते हैं।
किन्हें है सबसे ज्यादा खतरा और क्या हैं चेतावनी के संकेत?
चिकित्सीय अध्ययनों के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाएं इस बीमारी की शिकार अधिक होती हैं। विशेषकर 30 से 60 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं में इसके मामले सबसे ज्यादा दर्ज किए जाते हैं।
इन स्थितियों में बरतें विशेष सावधानी:
यदि परिवार में किसी को पहले से ऑटोइम्यून बीमारी रही हो (आनुवंशिक कारण)।
अत्यधिक धूम्रपान करने वाले और मोटापे (ओबेसिटी) से ग्रसित लोग।
यदि सुबह सोकर उठने के बाद जोड़ों में एक घंटे से अधिक समय तक अकड़न रहती हो, उंगलियों या जोड़ों की बनावट में बदलाव दिखने लगा हो, तो इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज न करें और तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करें। शुरुआती दौर में सटीक इलाज से इसके खतरों को काफी हद तक रोका जा सकता है।

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