मुंबई:देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के ऋणदाता, एचडीएफसी बैंक में चल रहा कॉर्पोरेट गवर्नेंस (कॉर्पोरेट शासन) का विवाद एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। बैंक के पूर्व चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती ने अपने इस्तीफे की परिस्थितियों को लेकर बैंक प्रबंधन द्वारा कराई गई बाहरी कानूनी जांच की प्रासंगिकता और जरूरत पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने इस पूरी कवायद को पूरी तरह से गैर-जरूरी करार दिया है। पूर्व चेयरमैन के इस कड़े रुख के बाद भारतीय बैंकिंग और वित्तीय जगत में एक बार फिर कॉर्पोरेट गवर्नेंस और बोर्ड के कामकाज के तरीकों को लेकर बहस तेज हो गई है।
जांच की शर्तों और पारदर्शिता की कमी के कारण अतानु चक्रवर्ती ने बनाई दूरी
पूर्व चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती ने इस पूरे मामले पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि उन्होंने इस स्वतंत्र जांच प्रक्रिया का हिस्सा बनने से पूरी तरह इनकार कर दिया था। इसके पीछे उनका सबसे मजबूत तर्क यह है कि बैंक प्रबंधन ने जांच का दायरा, उसकी सीमाएं और इसका कानूनी आधार कभी भी उनके साथ साझा नहीं किया था। विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चक्रवर्ती ने इस जांच प्रक्रिया से जुड़ने से पहले बैंक प्रबंधन से कई बार 'टर्म्स ऑफ रेफरेंस' (जांच की शर्तें और नियम) की मांग की थी, लेकिन बैंक की ओर से उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। चक्रवर्ती का साफ कहना है कि उन्होंने जो सैद्धांतिक और नैतिक स्टैंड लिया था, उसे सही साबित करने के लिए उन्हें किसी भी बाहरी या विदेशी एजेंसी से किसी प्रकार की मान्यता अथवा क्लीन चिट की कोई जरूरत नहीं है।
दो प्रतिष्ठित लॉ फर्मों की रिपोर्ट में पूर्व चेयरमैन के दावों को आधारहीन बताया
अतानु चक्रवर्ती की यह तीखी प्रतिक्रिया बैंक के उस आधिकारिक बयान के ठीक एक दिन बाद आई है, जिसमें एचडीएफसी बैंक ने स्टॉक एक्सचेंजों को सूचित किया था कि दो बाहरी कानूनी फर्मों द्वारा की जा रही जांच अब पूरी हो चुकी है। बैंक ने इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच के लिए घरेलू लॉ फर्म वाडिया गांडी एंड कंपनी और अमेरिकी लॉ फर्म विल्सन सोन्सिनी गुडरिच एंड रोसाटी को नियुक्त किया था। इस जांच प्रक्रिया के तहत बैंक के बोर्ड रिकॉर्ड, विभिन्न कमेटियों के दस्तावेज, समकालीन फाइलों और स्वतंत्र निदेशकों सहित सीनियर मैनेजमेंट के साथ बातचीत का बेहद गहन और बारीक परीक्षण किया गया। बैंक का दावा है कि इस विस्तृत जांच में पूर्व चेयरमैन द्वारा मार्च में दिए गए इस्तीफे में उठाई गई चिंताओं या आरोपों को सही ठहराने वाला कोई भी ठोस सबूत नहीं मिला है, और लॉ फर्म्स के निष्कर्ष चक्रवर्ती के दावों से पूरी तरह असंगत पाए गए हैं।
मार्च में हुए अचानक इस्तीफे ने बैंकिंग क्षेत्र में मचाई थी हलचल
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि इस साल 17 मार्च को अतानु चक्रवर्ती के अचानक दिए गए इस्तीफे से जुड़ी है, जिसने देश के बैंकिंग सेक्टर में इस साल की सबसे बड़ी गवर्नेंस बहस को जन्म दिया था। अपने संक्षिप्त त्यागपत्र में उन्होंने स्पष्ट तौर पर लिखा था कि पिछले दो वर्षों में बैंक के भीतर हुए कुछ नीतिगत घटनाक्रम और प्रथाएं उनके व्यक्तिगत मूल्यों तथा नैतिक मानकों के बिल्कुल खिलाफ थीं। हालांकि उन्होंने अपने पत्र में किसी विशेष घटना या उदाहरण का जिक्र नहीं किया था, लेकिन देश के इतने बड़े बैंक के मुखिया द्वारा नैतिक मानकों पर सवाल उठाने से निवेशकों और बाजार में गहरी चिंता फैल गई थी, जिसके बाद बोर्ड को अपनी साख बचाने के लिए इस बाहरी कानूनी जांच का सहारा लेना पड़ा था।
नेतृत्व परिवर्तन और निवेशकों के भरोसे को बहाल करने की चुनौती
यह पूरा घटनाक्रम एचडीएफसी बैंक के लिए एक बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण समय पर सामने आया है, क्योंकि बैंक इस समय अपने शीर्ष नेतृत्व में होने वाले कई प्रमुख बदलावों पर नियामक मंजूरियों का इंतजार कर रहा है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बैंक के मौजूदा मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एग्जीक्यूटिव शशिधर जगदीशन की पुनर्नियुक्ति का मामला है। पूर्व चेयरमैन के इस्तीफे के बाद कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर उठे सवालों ने इस साल निवेशकों के सेंटिमेंट पर भारी दबाव डाला था, जिससे बैंक के शेयरों पर भी असर देखा गया। बैंक का बोर्ड अपने उत्तराधिकार के एजेंडे को आगे बढ़ाने से पहले एक स्वतंत्र मूल्यांकन रिपोर्ट चाहता था ताकि बाजार के संदेह को दूर किया जा सके। अब बैंक ने जांच पूरी होने की घोषणा करते हुए गवर्नेंस के उच्च मानकों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, जो आने वाले समय में निवेशकों का भरोसा दोबारा जीतने में बेहद अहम साबित हो सकती है।

More Stories
IPO से पहले Silver Consumer Electricals को ₹150 करोड़ की फंडिंग, विस्तार को मिलेगी रफ्तार
सोना चढ़ा या उतरा? चांदी हुई ₹15,000 तक सस्ती, जानें आज के ताजा भाव
भारत-अमेरिका ट्रेड डील अंतिम चरण में, ट्रंप के दौरे की चर्चा तेज