नई दिल्ली। देश के प्रमुख आंतरिक सुरक्षा बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने महिलाओं के नेतृत्व, अटूट संकल्प और परिचालन उत्कृष्टता के चार दशक सफलतापर्वक पूर्ण होने के उपलक्ष्य में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर हासिल किया है। यह गौरवशाली अवसर वर्ष 1986 में भारत की प्रथम पूर्ण महिला लड़ाकू बटालियन (88वीं महिला बटालियन) के गठन की स्मृति में मनाया जा रहा है, जिसने देश के सुरक्षा बलों में महिला कार्मिकों के लिए एक अनुपम मिसाल कायम की है। राष्ट्र निर्माण से लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) शांति मिशनों तक सीआरपीएफ के महिला दस्तों ने अपनी वीरता की गहरी छाप छोड़ी है।
शौर्य की चार दशक लंबी गौरवशाली यात्रा
इस 40-वर्षीय गौरवशाली विरासत का सम्मान करने के लिए नई दिल्ली स्थित शौर्य ऑफिसर्स इंस्टीट्यूट में एक विशेष समारोह का भव्य आयोजन किया गया। इस गरिमामयी अवसर पर बल का वरिष्ठ नेतृत्व, विशिष्ट पूर्व सैनिक (वेटरन्स), सेवारत कर्मी और गणमान्य अतिथि अग्रिम पंक्ति के अभियानों में महिलाओं की परिवर्तनकारी यात्रा के साक्षी बनने के लिए एकत्रित हुए। इस समारोह की अध्यक्षता सीआरपीएफ के महानिदेशक जीपी सिंह ने की, तथा सीआरपीएफ परिवार कल्याण संघ की अध्यक्षा डॉ. अनामिका सिंह भी कार्यक्रम में विशेष रूप से उपस्थित रहीं।
महानिदेशक द्वारा विशिष्ट वीरांगनाओं का सम्मान
समारोह के दौरान महानिदेशक ने देश की संप्रभुता एवं अखंडता की रक्षा में समर्पित सेवा, असाधारण साहस और सर्वोच्च बलिदान देने वाली विशिष्ट महिला पूर्व सैनिकों और सेवारत अधिकारियों को सम्मानित किया। डीजी जीपी सिंह ने अपने संबोधन में कहा, 'चालीस वर्ष पूर्व सीआरपीएफ ने देश की पहली पूर्ण महिला बटालियन की स्थापना कर एक ऐतिहासिक बदलाव की नींव रखी थी। वर्तमान समय में हमारी महिला कर्मी अत्यंत दुर्गम क्षेत्रों, आतंकवाद विरोधी अभियानों तथा संवेदनशील कानून-व्यवस्था की ड्यूटियों में दृढ़ संकल्प के साथ तैनात हैं। बल का नेतृत्व अपनी इन महिला वीरांगनाओं के शौर्य, अनुकरणीय अनुशासन और निःस्वार्थ सेवा को नमन करता है।'
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह बल वर्दीधारी महिलाओं को नए अवसर और संस्थागत सहयोग प्रदान करने के प्रति निरंतर कटिबद्ध है। महानिदेशक ने जवानों और उनके परिवारों के धैर्य की सराहना करते हुए देश के संवेदनशील क्षेत्रों तथा संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में सेवारत कर्मियों के कल्याण के लिए 'सीआरपीएफ परिवार कल्याण संघ' द्वारा चलाई जा रही विभिन्न पहलों पर भी प्रकाश डाला।
वर्ष 1986 में हुआ था महिला बटालियन का ऐतिहासिक गठन
वर्ष 1986 में स्थापित सीआरपीएफ की 88वीं महिला बटालियन न केवल भारत अपितु संपूर्ण विश्व के अर्धसैनिक बलों के इतिहास में प्रथम पूर्ण महिला सशस्त्र पुलिस बटालियन थी। पिछले चार दशकों में इन महिला कार्मिकों ने आतंकवाद विरोधी अभियानों, दंगा नियंत्रण, वीआईपी सुरक्षा, नक्सल विरोधी विशेष अभियानों तथा वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में उत्कृष्ट सेवाएं दी हैं, और कई वीरता तथा विशिष्ट सेवा पदकों से अलंकृत हुई हैं। वर्तमान में छह विशेष महिला बटालियनें महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्रों में पूर्ण रूप से तैनात हैं। इसके अतिरिक्त, भीड़ नियंत्रण और दंगा-रोधी कार्यों हेतु प्रत्येक रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) इकाई में चार महिला टीमों को नियुक्त किया गया है।
वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए समर्पित 'बस्तरिया बटालियन' समेत एकीकृत महिला दल अग्रिम मोर्चे पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इन बहादुर कर्मियों ने हर विषम परिस्थिति में यह सिद्ध किया है कि कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन और वीरता लिंग भेद से परे होती है।
प्रमुख वीरता पुरस्कार और सर्वोच्च बलिदान
सीआरपीएफ की महिला योद्धाओं ने देश के सुरक्षा इतिहास में अद्वितीय स्थान बनाया है, जिनका विवरण इस प्रकार है:
-
अशोक चक्र (मरणोपरांत): कांस्टेबल कमलेश कुमारी को भारत के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार 'अशोक चक्र' से सम्मानित किया गया था। उन्हें यह पुरस्कार संसद भवन पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान उनके अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए प्रदान किया गया था।
-
सेना पदक और प्रशस्ति पत्र: कांस्टेबल विमला देवी (सेना पदक) तथा लांस नायक राजवान देवी (सेना प्रमुख प्रशस्ति पत्र) ने श्रीलंका स्थित एलिफेंट पास चेक पोस्ट (वर्ष 1988) पर महत्वपूर्ण परिचालन भूमिका का निर्वहन किया था।
-
अग्रिम पंक्ति में वीरता: कांस्टेबल बिंदू कुमरे को वर्ष 2001 में श्रीनगर हवाई अड्डे पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान प्रदर्शित असाधारण वीरता के लिए 'वीरता पदक' से सम्मानित किया गया था।

More Stories
शहरों और गांवों के बीच घटा अंतर, पिछले 12 साल में भारत में बड़ा बदलाव
असम में भीषण अग्निकांड, पांच व्यापारिक प्रतिष्ठान जलकर राख
‘जेल भेजा, अब एनकाउंटर का डर’, लेह हिंसा की बरसी पर सोनम वांगचुक ने केंद्र पर साधा निशाना