यरुशलम। इजराइल में आम चुनाव प्रक्रिया और राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद अब नतीजों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं। 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद से इस क्षेत्र में उत्पन्न राजनीतिक और सामरिक अनिश्चितता के माहौल में इन चुनावों को बेहद अहम माना जा रहा है। इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है। यह एक सिंगल चैंबर विधायी प्रणाली है, जिसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। भारत की तरह इजराइल में कोई दूसरा उच्च सदन मौजूद नहीं है, देश के सभी कानून और विधायी निर्णय इसी 120 सदस्यीय नेसेट द्वारा लिए जाते हैं।
चार साल का तय कार्यकाल और नेसेट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
संवैधानिक रूप से नेसेट का आधिकारिक कार्यकाल चार साल का तय होता है। हालांकि इजराइल के बहुदलीय और गठबंधन आधारित राजनीतिक ढांचे के कारण संसद अक्सर अपना चार साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती है और इसे तय समय से पहले भी भंग किया जा सकता है। नेसेट शब्द का अर्थ असेंबली यानी सभा होता है, और इसकी 120 सदस्यों वाली संरचना ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी की प्राचीन यहूदी प्रतिनिधि परिषद से प्रेरित है। इजराइल राष्ट्र की स्थापना के बाद फरवरी 1949 में देश की पहली संसद चुनी गई थी।
एक राष्ट्रीय निर्वाचन क्षेत्र और समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली
इजराइल की चुनावी प्रणाली दुनिया के अन्य देशों से अलग है। चुनाव के लिए पूरे देश को एक ही राष्ट्रीय निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है, जहां कोई अलग-अलग भौगोलिक संसदीय सीटें नहीं होती हैं। मतदाता किसी व्यक्तिगत स्थानीय उम्मीदवार को वोट देने के बजाय अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं। चुनाव से पहले हरेक राजनीतिक दल उम्मीदवारों की एक प्राथमिकता सूची जारी करता है। राष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त कुल वोटों के अनुपात के आधार पर पार्टियों को संसद में सीटें दी जाती हैं। हालांकि संसद में प्रवेश पाने के लिए किसी भी पार्टी को कुल वोट का कम से कम 3.25 फीसदी हासिल करना जरूरी होता है।
बहुमत का आंकड़ा और गठबंधन सरकारों का इतिहास
नेसेट में सरकार बनाने या बहुमत साबित करने के लिए कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है। इजराइल के इतिहास में आज तक किसी भी एकल पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, जिसके कारण हमेशा गठबंधन सरकारें ही बनी हैं। चुनाव के बाद राष्ट्रपति उस नेता को पीएम पद की शपथ और सरकार बनाने का आमंत्रण देते हैं जिसके पास 61 सांसदों का समर्थन होता है। यदि सरकार वार्षिक राज्य बजट पारित करने में विफल रहती है, संसद स्वयं विघटन का प्रस्ताव पारित कर देती है या प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति की सहमति से आदेश जारी करते हैं, तो चार साल के कार्यकाल से पहले भी संसद भंग की जा सकती है।

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