November 3, 2026

UN में भारत-इस्राइल ने प्रस्ताव का किया विरोध, कहा- सुरक्षा सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं

न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक मंच पर पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण को लेकर पाकिस्तान और बेलارूस द्वारा लाए गए एक प्रस्ताव के विरुद्ध भारत और इस्राइल ने कड़ा रुख अपनाते हुए इसके खिलाफ मतदान किया है। भारत ने स्पष्ट रूप से यह दो टूक बात कही है कि किसी भी संप्रभु देश की सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं और खतरे कभी भी केवल उसकी भौगोलिक या क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रह सकते हैं, बल्कि उनका दायरा काफी विस्तृत होता है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में हुआ मतदान

'सामान्य और पूर्ण निरस्त्रीकरण : क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय स्तर पर पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण' नामक शीर्षक से प्रस्तुत किए गए इस विवादास्पद प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति के समक्ष मंजूरी के लिए रखा गया था। इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 180 देशों ने अपने मत डाले, जबकि वैश्विक पटल पर केवल भारत और इस्राइल ही ऐसे दो देश रहे जिन्होंने इसके विरोध में अपना मत दर्ज कराया। हैरानी की बात यह रही कि इस प्रक्रिया के दौरान किसी भी देश ने मतदान से तटस्थ रहने या दूरी बनाने का विकल्प नहीं चुना।

भारत के स्थायी मिशन द्वारा प्रस्ताव के विरोध की मुख्य वजहें

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनमोल शेर बेदी ने भारत के इस रुख और मतदान की आधिकारिक वजहों को दुनिया के सामने रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण का विषय मूल रूप से एक वैश्विक सरोकार है और भारत इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं है कि इस गंभीर मुद्दे को संकुचित करते हुए केवल क्षेत्रीय या उपक्षेत्रीय स्तर तक ही सीमित कर दिया जाए। भारत ने अपनी स्थापित और सुसंगत विदेश नीति के तहत ही इस प्रस्ताव के विरोध में अपना मत दिया है। इसके साथ ही, भारत ने प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण आयोग से पारंपरिक हथियारों के क्षेत्रीय समझौतों हेतु नए सिरे से रूपरेखा तैयार करने का अनुरोध किए जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताई।

पूर्व में सर्वसम्मति से स्वीकृत नतीजों की अनदेखी पर सवाल

भारतीय राजनयिक ने अपने संबोधन में रेखांकित किया कि संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण आयोग द्वारा वर्ष 1993 में क्षेत्रीय निरस्त्रीकरण पर विस्तृत दिशा-निर्देश पहले ही सर्वसम्मति से स्वीकार किए जा चुके हैं। इसके पश्चात वर्ष 1999 में पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण तथा वर्ष 2017 में व्यावहारिक विश्वास बहाली के उपायों से संबंधित सिफारिशों को भी बिना किसी विरोध के अपनाया जा चुका है। भारत का यह तर्क रहा है कि जब इसी विषय पर आयोग के भीतर पहले ही तीन बार सर्वसम्मति से व्यापक नतीजे सामने आ चुके हैं, तो फिर से शून्य से शुरुआत करने या उसी पुरानी प्रक्रिया को दोहराने का कोई औचित्य नहीं है। भारत ने आशंका जताई कि इस प्रकार के प्रस्तावों का एकमात्र उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र की निरस्त्रीकरण व्यवस्था को अनावश्यक रूप से उलझाए रखना प्रतीत होता है।

क्षेत्रीय सीमाओं से परे होती हैं राष्ट्रों की सुरक्षा चिंताएं

पारंपरिक हथियारों के संतुलन और क्षेत्रीय सीमाओं के निर्धारण पर आपत्ति जताते हुए अनमोल शेर बेदी ने कहा कि प्रस्ताव की मूल भावना यह मानकर चलती है कि देशों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं उनकी भौगोलिक सीमाओं के भीतर ही समाप्त हो जाती हैं, जो कि वास्तविक भू-राजनीतिक सच्चाई के बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने दो टूक कहा कि राष्ट्रों की सुरक्षा चिंताएं सीमित क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय सीमाओं से कहीं आगे तक फैली होती हैं, और किसी भी क्षेत्र विशेष में सैन्य संतुलन बनाए रखने की अवधारणा व्यावहारिक धरातल पर खरी नहीं उतरती। पाकिस्तान और बेलارूस के इस प्रस्ताव में दक्षिण एशिया के संदर्भों का उल्लेख करते हुए लैटिन अमेरिका के उदाहरणों को जोड़ा गया था, जिसका भी भारत ने पुरजोर विरोध किया है।