यिंगकियोंग। अरुणाचल प्रदेश के सियांग क्षेत्र में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की 'सियांग अपर मल्टीपर्पस प्रोजेक्ट' (SUMP) को लेकर स्थानीय आदि आदिवासी समुदाय और सरकार के बीच गतिरोध लगातार गहराता जा रहा है। इस मेगा प्रोजेक्ट के विरोध का केंद्र बने गेकू और उसके आसपास के गांवों में उस वक्त तनाव और बढ़ गया, जब सुरक्षा बलों ने स्थानीय ग्रामीणों से पारंपरिक औजार 'दाओ' जब्त करने की कार्रवाई शुरू कर दी। आदि समुदाय के लिए दाओ का सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्व है, जो उनकी पहचान से जुड़ा हुआ है।
दाओ जब्ती पर आदि समुदाय का आक्रोश
रीगा और पांगकांग गांवों में सुरक्षा कर्मियों पर दाओ से हमले के कथित आरोपों के बाद प्रशासन ने एहतियाती कदम उठाते हुए ग्रामीणों से दाओ जब्त करना शुरू कर दिया, जिससे स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा है। किसानों का कहना है कि वे रोजाना अपनी कमर पर दाओ बांधकर खेतों में काम करने जाते हैं, जिससे बांस काटने और झाड़ियां साफ करने जैसे जरूरी काम किए जाते हैं। गेकू के एक स्थानीय किसान जॉन पन्यांग का कहना है कि दाओ उनकी जीविका और सांस्कृतिक पहचान दोनों का अहम हिस्सा है, इसलिए उन्हें खेतों में इसे ले जाने से रोकना गलत है।
27 गांवों ने मिलाया हाथ, खेती और त्योहार प्रभावित
अपर सियांग और सियांग जिलों के करीब 27 गांवों ने इस विशाल बांध परियोजना के खिलाफ एकजुट होकर मोर्चा खोल दिया है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य जलाशय गेकू के पास प्रस्तावित है, जो जिला मुख्यालय यिंगकियोंग से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर है। इस तीव्र विरोध प्रदर्शन के कारण क्षेत्र की कृषि गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। ढलानों और नदी किनारे उगाई जाने वाली पारंपरिक चावल की किस्में जैसे गेगोंग, ईटानगर, नगोटसुम और ताकर की खेती करने वाले किसान समय पर खेतों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इसके अलावा, आंदोलन के चलते आदि समुदाय ने अपने प्रमुख त्योहार 'सोलुंग' के आयोजनों को भी सीमित कर केवल झंडा फहराने तक ही सीमित रखा है।
ड्रिलिंग और फिजिबिलिटी सर्वे का विरोध
ग्रामीणों का आरोप है कि सुरक्षा बलों की इस सख्ती का मुख्य उद्देश्य एनएचपीसी (NHPC) के लिए प्री-फिजिबिलिटी सर्वे और नदी तल में ड्रिलिंग के रास्ते की बाधाओं को दूर करना है। स्थानीय लोगों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि वे अपने क्षेत्र में किसी भी तरह की ड्रिलिंग या फिजिबिलिटी रिपोर्ट नहीं तैयार होने देंगे।
सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए ग्रामीण जॉन पन्यांग ने तर्क दिया कि यदि इस बांध का उद्देश्य सीमा पार चीन द्वारा बनाए जा रहे बांधों का मुकाबला करना है, तो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से 300 किलोमीटर दूर सियांग क्षेत्र में इतना बड़ा प्रोजेक्ट क्यों लाया जा रहा है? उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को अपनी ही स्थानीय आबादी को विस्थापित करने के बजाय सीमा के पास अन्य सामरिक विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
विस्थापन का डर और मुआवजे से इंकार
गेकू बस्ती में रहने वाले करीब 1,000 परिवारों के लिए यह बांध उनकी पैतृक जमीन, संस्कृति और अस्तित्व पर मंडराता हुआ सीधा खतरा बन गया है। अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह खेती पर निर्भर इन परिवारों का इतिहास रहा है कि वे 1960 के दशक में कुमकु पहाड़ियों से नीचे आकर नदी के किनारे बसे थे। ग्रामीणों को आशंका है कि बांध बनने के बाद जलभराव या पानी छोड़े जाने से उनकी पूरी बसाहट पानी में डूब जाएगी।
स्थानीय निवासी ओकेन बोली पैंग्येंग ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण अपनी पुश्तैनी जमीन और घरों को खोने के एवज में किसी भी प्रकार का मुआवजा स्वीकार नहीं करेंगे। अपने जल-जंगल और जमीन को बचाने के इस आंदोलन को प्राथमिकता देते हुए ग्रामीण अपनी धान की फसल की कटाई को भी टालने को पूरी तरह तैयार हैं।

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