भोपाल| क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, श्यामला हिल्स, भोपाल में हिंदी माह के समापन समारोह का भव्य आयोजन किया गया। यह विशेष समारोह मुख्य अतिथि डॉ. धर्मेंद्र पारे, निदेशक (जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी) की गरिमामयी उपस्थिति में तथा प्राध्यापक शिवकुमार गुप्ता, प्राचार्य (क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भोपाल) की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस अवसर पर संस्थान के सभी विभागाध्यक्ष और समस्त संकाय सदस्य उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का सफल मंच संचालन डॉ. अरूणाभ सौरभ द्वारा किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक रूप से दीप प्रज्वलन और वंदना के साथ हुआ। मुख्य अतिथि डॉ. धर्मेंद्र पारे, प्राचार्य प्रोफेसर शिवकुमार गुप्ता और विशिष्ट अतिथि प्रकाशचंद्र झा मंच पर आसीन रहे। प्राचार्य महोदय ने मुख्य अतिथि को शॉल और श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया तथा उन्हें प्रशस्ति पत्र प्रदान किया। इसके साथ ही प्रकाशचंद्र झा जी को भी प्रशस्ति पत्र और श्रीफल देकर सम्मानित किया गया।
लोक बोलियों के सम्मान से ही भाषा का होता है व्यापक विकास
मुख्य अतिथि डॉ. धर्मेंद्र पारे ने अपने प्रेरणादायी वक्तव्य में लोक बोली के महत्व को गहराई से उजागर करते हुए कहा कि कोई भी भाषा विभिन्न लोक बोलियों के अनूठे मिश्रण से ही बनती है। इसलिए भाषा के समग्र सम्मान में उसकी लोक बोलियों का सम्मान भी अनिवार्य रूप से निहित होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भाषाओं का भी अपना एक लोकतंत्र होना चाहिए। इस लोकतंत्र का आशय यह है कि सभी भाषाएँ और बोलियाँ अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ सुरक्षित रहें तथा अपनी पूरी प्रतिष्ठा के साथ समाज में बोली और समझी जाती रहें। उन्हें एक-दूसरे के अस्तित्व से किसी भी प्रकार के खतरे की आशंका नहीं होनी चाहिए।
डॉ. धर्मेंद्र पारे ने भाषा के बीच आपसी साझेदारी की आवश्यकता को भी रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषा की यह साझेदारी बेहद आवश्यक है, क्योंकि यही साझेदारी भाषा के प्रसार और उसकी दीर्घायु को बढ़ाती है। इसके साथ ही उन्होंने वर्तमान समय में लोकबोलियों के लगातार हो रहे ह्रास पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज जनजातीय वर्ग के लोग तो हिंदी सीख रहे हैं, परंतु मुख्यधारा की हिंदी भाषा अभी भी उतनी गहराई तक लोक बोलियों तक नहीं पहुँच पा रही है।
छात्रों द्वारा ‘अंधा युग’ नाटक की मनमोहक और सराहनीय प्रस्तुति
डॉ. धर्मेंद्र पारे के उद्बोधन के ठीक पश्चात् प्रसिद्ध कृति “अंधा युग” नाटक का मंचन किया गया। इस नाटक का कुशल निर्देशन डॉ. अरूणाभ सौरभ ने किया था। क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भोपाल के विद्यार्थियों द्वारा अभिनीत इस नाटक की प्रस्तुति अत्यंत सराहनीय और प्रभावकारी रही।
‘अंधा युग’ नाटक का साहित्यिक महत्व और पृष्ठभूमि
“अंधा युग” प्रख्यात रचनाकार धर्मवीर भारती का एक अत्यंत प्रसिद्ध दृश्य काव्य है, जिसकी गणना हिंदी साहित्य के श्रेष्ठतम नाटकों में की जाती है। अपने प्रथम प्रकाशन से लेकर आज तक यह नाटक हिंदी जगत में बहुचर्चित, बहुधा मंचित और अत्यधिक प्रशंसित रहा है। हिंदी नाटक और रंगमंच के इतिहास में यह एक शास्त्रीय प्रतिमान स्थापित करता है। इस प्रतिमान में एक तरफ जहाँ तत्कालीन समय, समाज और परिस्थितियों का जीवंत कोलाज दिखाई देता है, वहीं दूसरी तरफ नाटक और रंगमंच से जुड़े उत्कृष्ट विधागत प्रतिमान भी स्पष्ट रूप से नजर आते हैं।
धर्मवीर भारती ने जिस कलात्मक तरीके से युद्ध और उन्माद की भयंकर विभीषिका को प्रस्तुत किया है, वह वास्तव में अद्भुत है। उन्होंने महाभारत काल की कथावस्तु का उपयोग अपने समय की विखंडित मर्यादा और युद्धोन्माद को प्रभावशाली ढंग से प्रदर्शित करने के लिए किया है। युद्ध के जो भयानक और भयावह परिणाम होते हैं, उनका जितना सजीव चित्रण इस नाटक में मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। महाभारत महाकाव्य के बीच से उभरकर आए विभिन्न पात्र अपने मूल कालखंड से निकलकर हमारे वर्तमान समय को बहुत गहराई से रेखांकित और विवेचित कर रहे हैं। यही इस नाटक का मुख्य रचनात्मक उत्स है।
नाटककार ने पौराणिक कथा को समकालीन भावबोध के धरातल पर बहुत ही सुंदर ढंग से रूपांतरित किया है। आज के विघटित हो रहे मूल्यों, अमानवीय युद्धोन्माद तथा मर्यादाहीन समस्याओं को नाटक में प्रमुखता से स्थान दिया गया है। नाटककार ने युद्ध के दुष्परिणामों, उसके विध्वंसकारी प्रभावों, धर्म-अधर्म और आदर्श-यथार्थ जैसे जीवन के बुनियादी सत्यों का बारीकी से मूल्यांकन किया है। इसमें मानवीय मर्यादा की टूटती हुई पतली डोर लेखक की मुख्य चिंता का केंद्र रही है। सबसे खास बात यह रही कि “अंधा युग” को संस्थान के ऐसे विद्यार्थियों ने मंच पर प्रस्तुत किया, जो पहली बार रंगमंच पर कला का प्रदर्शन कर रहे थे। अंत में प्राचार्य प्रोफेसर शिवकुमार गुप्ता के अध्यक्षीय उद्बोधन और डॉ. अरूणाभ सौरभ के धन्यवाद ज्ञापन के साथ यह गरिमामयी समारोह संपन्न हुआ।

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