पटना। पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के अधिकारियों की प्रशासनिक और तकनीकी कमियों का खामियाजा ठेकेदारों पर थोपने की कार्यशैली पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति जी. अनुपमा चक्रवर्ती की एकल पीठ ने मुख्यमंत्री शहरी विकास योजना के तहत सड़क निर्माण करने वाले एक ठेकेदार की याचिका को स्वीकार करते हुए खगड़िया के जिलाधिकारी के उस मनमाने आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसके तहत ठेकेदार का अंतिम भुगतान और सिक्योरिटी डिपॉजिट (सुरक्षा निधि) की राशि रोक दी गई थी।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला ग्रामीण कार्य विभाग, बिहार सरकार के पंजीकृत श्रेणी-II के ठेकेदार नवीन कुमार (निवासी बेगूसराय) से जुड़ा हुआ है। उन्हें खगड़िया जिले में बखरी बस स्टैंड से बलुआही बापू पार्क तक 2.70 किलोमीटर लंबी बाईपास सड़क के निर्माण का ठेका दिया गया था, जिसकी अनुबंध राशि लगभग 1.37 करोड़ रुपये थी।
ठेकेदार के अनुसार, उन्होंने तय 12 महीने की समय-सीमा के भीतर ही सड़क निर्माण का कार्य पूरी तरह संतोषजनक ढंग से पूरा कर लिया था और संबंधित प्राधिकारी से कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र (Completion Certificate) भी प्राप्त कर लिया था। इस अनुबंध की कुल राशि में से 1,22,89,020 रुपये का भुगतान तो पहले ही किया जा चुका था, लेकिन अंतिम बिल की 13,67,134 रुपये और सिक्योरिटी डिपॉजिट की 6,14,451 रुपये की राशि रोक ली गई थी। इस प्रकार कुल 19,81,585 रुपये का भुगतान लंबित था। इससे पहले वर्ष 2017 में भी हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी को इस मामले में निर्णय लेने का निर्देश दिया था, जिसके बाद 15 दिसंबर 2017 को डीएम ने ठेकेदार के दावे को खारिज कर दिया था।
विभागीय कमियों का ठीकरा ठेकेदार पर मढ़ने पर अदालत की सख्त टिप्पणी
जिलाधिकारी के आदेश में भुगतान रोकने के पीछे यह अजीब तर्क दिया गया था कि विभागीय स्तर पर उचित पर्यवेक्षण नहीं हुआ, मेजरमेंट बुक (MB) में कमियां थीं और सड़क निर्माण के एस्टीमेट (प्राक्कलन) में तकनीकी खामियां थीं।
पटना हाईकोर्ट ने इस आधार को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया कि यदि विभागीय अधिकारियों की तरफ से प्रशासनिक दायित्वों, तकनीकी पर्यवेक्षण या रिकॉर्ड-कीपिंग में किसी भी प्रकार की लापरवाही बरती गई है, तो उसका दंड ठेकेदार को नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब ठेकेदार ने निर्धारित समयावधि में अपना कार्य पूरी ईमानदारी से पूरा कर दिया है और उसकी ओर से अनुबंध के उल्लंघन का कोई भी प्रमाण नहीं मिला है, तो उसका वैध और पारिश्रमिक बकाया भुगतान रोकना पूरी तरह अनुचित है।
ब्याज सहित भुगतान करने का निर्देश
अदालत ने खगड़िया के जिलाधिकारी द्वारा 15 दिसंबर 2017 को जारी किए गए भुगतान अस्वीकार करने वाले आदेश को खारिज करते हुए ठेकेदार के लंबित अंतिम बिल और सिक्योरिटी डिपॉजिट की पूरी रोकी गई राशि जारी करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने पूर्व के न्यायिक आदेश के अनुरूप रोकी गई इस स्वीकृत राशि का भुगतान पांच प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज (5% Simple Interest) के साथ करने का भी निर्देश दिया है। हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से अधिकारियों की मनमानी पर रोक लगने और प्रशासनिक लापरवाही के शिकार ठेकेदारों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

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