नई दिल्ली। सियासी गलियारों में कई दफा किसी गतिविधि का न होना भी अपने आप में एक बड़ा संदेश दे जाता है। बुधवार, दो सितंबर को केंद्रीय कैबिनेट की नियमित बैठक नहीं बुलाई गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक से स्वदेश लौट चुके थे और राष्ट्रीय राजधानी में मौजूद रहकर विभागीय कार्यक्रमों में हिस्सा भी ले रहे थे, फिर भी कैबिनेट बैठक का न होना चर्चा का विषय बन गया। इस खामोशी के पीछे के सियासी संकेतों को समझने के लिए बीते सप्ताह के घटनाक्रम पर गौर करना जरूरी है।
26 अगस्त को आयोजित केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक के उपरांत किसी बड़े फैसले का ऐलान नहीं किया गया था। सूत्रों के मुताबिक, उसी बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने अपने सहयोगियों को साफ तौर पर संकेत दिया था कि आगामी कैबिनेट बैठक में कुछ नए चेहरे शामिल होंगे। इस बयान के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि अब मंत्रिमंडल की अगली औपचारिक बैठक नए सदस्यों के शपथ ग्रहण और फेरबदल के बाद ही आयोजित की जाएगी।
व्यस्त सियासी कैलेंडर और फेरबदल की संभावित तारीखें
सरकार के सामने फिलहाल तारीखों का तालमेल बिठाना एक बड़ी चुनौती है। विदेश मंत्री एस जयशंकर तीन से पांच सितंबर तक पोलैंड और यूक्रेन के आधिकारिक दौरे पर रहेंगे। इसके बाद 12 और 13 सितंबर को राजधानी के भारत मंडपम में भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन होना है, जिसमें वैश्विक नेता शामिल होंगे। वहीं, 17 सितंबर से पार्टी का महीने भर चलने वाला राष्ट्रव्यापी सेवा पखवाड़ा भी शुरू हो रहा है। ऐसे में छह और सात सितंबर का समय ही सबसे मुफीद नजर आ रहा है, जब मोदी मंत्रिमंडल के बहुप्रतीक्षित पुनर्गठन को अंजाम दिया जा सकता है।
मंत्रालयों में बड़ा फेरबदल और नए चेहरों को मौका
इस बार मंत्रालयों के कार्यभार में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकता है। कई ऐसे वरिष्ठ मंत्री जिनके पास तीन से चार विभागों का अतिरिक्त प्रभार है, उनसे कुछ जिम्मेदारियां लेकर नए व ऊर्जावान चेहरों को सौंपी जा सकती हैं। युवा वर्ग से बेहतर संवाद स्थापित करने वाले नेताओं और शिक्षा जैसे अहम विभागों के लिए वैचारिक रूप से मजबूत व्यक्तित्वों को आगे लाने की तैयारी है। इसके अलावा कई चौंकाने वाले नाम भी लिस्ट में शामिल हो सकते हैं।
उम्र का पैमाना और सांगठनिक जिम्मेदारियां
मंत्रिमंडल में 70 वर्ष से अधिक उम्र के लगभग 14 मंत्रियों की उपस्थिति को देखते हुए उम्र की कसौटी पर भी कड़े फैसले लिए जा सकते हैं। इस आयु वर्ग के कुछ वरिष्ठ नेताओं को सरकार से मुक्त कर संगठन या राज्यों में राज्यपाल जैसी संवैधानिक भूमिकाओं में भेजा जा सकता है, ताकि नई पीढ़ी के नेताओं को मुख्यधारा में अवसर मिल सके।
गठबंधन दलों का गणित और क्षेत्रीय संतुलन
एनडीए के सहयोगी दलों की बढ़ती ताकत और आकांक्षाओं को साधना भी सरकार की प्राथमिकता में है। हाल ही में गठबंधन का हिस्सा बने नए गुटों और सहयोगी दलों जैसे शिवसेना (शिंदे गुट) और एनसीपी की अतिरिक्त मंत्री पदों की मांग पर विचार करना होगा। दक्षिण भारत में क्षेत्रीय समीकरणों और संतुलन को बनाए रखने के लिए भी कुछ अहम पदों का आवंटन किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश पर खास नजर, रवि किशन के नाम की चर्चा
राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश पर नेतृत्व का विशेष ध्यान है। चर्चाओं में गोरखपुर से सांसद रवि किशन का नाम प्रमुखता से उभर रहा है। ब्राह्मण समीकरणों को मजबूती देने और आम जनता के बीच उनकी व्यापक लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें केंद्रीय टीम में राज्यमंत्री अथवा कोई स्वतंत्र प्रभार की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

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