August 31, 2026

15 लाख के जुर्माने पर हाई कोर्ट की सख्ती, साइकिल खड़ी करने वाले को मिली राहत

मुंबई | महाराष्ट्र की आर्थिक राजधानी मुंबई से साइकिल पार्किंग को लेकर एक बेहद अजीबोगरीब और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ एक आवासीय हाउसिंग सोसायटी ने सीढ़ियों के पास साइकिल खड़ी करने के मामूली विवाद पर अपने ही दो सदस्यों पर 15 लाख रुपये से अधिक का भारी-भरकम जुर्माना ठोक दिया था। इस मनमानी और तानाशाही रवैये पर कड़ा रुख अपनाते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने न सिर्फ हाउसिंग सोसायटी को बल्कि सहकार उपनिबंधक (Deputy Registrar) को भी जमकर फटकार लगाई है और जुर्माने के इस आदेश को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।

11 साल तक साइकिल खड़ी करने पर थोप दिया 15.45 लाख का जुर्माना

यह पूरा मामला मुंबई स्थित 'धनलक्ष्मी को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी' का है। सोसायटी की दो महिला सदस्यों, योगिनी और सेजल पर यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने इमारत की सीढ़ियों के पास खाली पड़ी जगह में कथित तौर पर करीब 11 वर्षों तक अपनी साइकिलें पार्क की थीं। सोसायटी प्रबंधन ने इस तथाकथित नियम उल्लंघन का हवाला देते हुए दोनों सदस्यों को कई बार नोटिस थमाए और बाद में उन पर भारी-भरकम जुर्माने की मांग कर डाली।

जब यह विवाद नहीं सुलझा, तो मामला जबरन वसूली के लिए सहकार विभाग के उपनिबंधक के पास पहुँच गया। उपनिबंधक ने पिछले साल अप्रैल के महीने में एक वसूली प्रमाण-पत्र (Recovery Certificate) भी जारी कर दिया। इसके बाद दोनों पीड़ित फ्लैटधारकों ने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए औपचारिक आवेदन दिया, जिस पर सुनवाई करते हुए उपनिबंधक ने रिकवरी सर्टिफिकेट तो रद्द कर दिया, लेकिन जुर्माने की भारी-भरकम रकम को लेकर मामले को दोबारा विचार के लिए वापस भेज दिया, जिससे विवाद और बढ़ गया।

बॉम्बे हाई कोर्ट की सख्त और दो टूक टिप्पणियां

सोसायटी के इस तानाशाही फैसले से परेशान होकर दोनों सदस्यों ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और एक रिट याचिका दायर की। मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की खंडपीठ ने हाउसिंग सोसायटी की कार्रवाई और जुर्माना वसूलने के तौर-तरीकों पर बेहद गंभीर सवाल खड़े किए।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी मामूली और छोटी सी बात के लिए इतना बड़ा भारी जुर्माना लगाना किसी भी स्थिति में न्यायसंगत और उचित नहीं ठहराया जा सकता। हाई कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि 'मॉडल उप-नियम 169(अ)' का इस्तेमाल किसी भी हाल में मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता है। अदालत ने सहकारिता समितियों के कामकाज में विवेक और वाजिबता (Reasonableness) बरतने की सख्त जरूरत पर जोर दिया और कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि किसी भी हाउसिंग सोसायटी को खुद को किसी 'सर्वोच्च नियामक प्राधिकरण' (Supreme Regulatory Authority) की तरह पेश करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

'वर्षों तक चुप्पी साधकर बाद में भारी जुर्माना वसूलना गलत'

अदालत ने इस बात पर भी गहरी नाराजगी जताई कि यदि वास्तव में सोसायटी को सीढ़ियों के पास साइकिलें खड़ी करने को लेकर कोई आपत्ति थी, तो जिस समय साइकिलें रखी जा रही थीं, उसी वक्त तुरंत आपत्ति दर्ज कराकर उन्हें वहां से हटाने का सख्त निर्देश दिया जाना चाहिए था।

इसके विपरीत, वर्षों तक इस स्थिति को चुपचाप चलने देना और अचानक बाद में 11 साल की लंबी अवधि का कुल योग निकालकर भारी-भरकम जुर्माना थोप देना किसी भी सूरत में वैध या सही नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह माना कि हालांकि एक अनुशासित हाउसिंग सोसायटी में नियमों का पालन होना बेहद जरूरी है, परंतु उन नियमों की आड़ में सदस्यों पर अविवेकपूर्ण और मनमाने तरीके से आर्थिक दंड या जुर्माना थोपने का अधिकार किसी को नहीं है।

अदालत ने यह भी गौर किया कि सोसायटी की ओर से मॉडल उप-नियम 169(अ) को लागू किए जाने की प्रक्रिया को लेकर भी रिकॉर्ड में कोई स्पष्टता नहीं थी। इन तमाम कानूनी पहलुओं और तर्कों के आधार पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाउसिंग सोसायटी द्वारा लगाया गया 15,45,730 रुपये का पूरा जुर्माना रद्द कर दिया, जिससे दोनों फ्लैटधारकों ने राहत की सांस ली है।