सरगुजा: छत्तीसगढ़ के आदिवासी विकास विभाग द्वारा संचालित छात्रावासों और आश्रमों की बदहाल व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। जिले के 12 से अधिक हॉस्टलों और आश्रमों की इमारतों में बारिश के दौरान छतों से पानी टपकने की गंभीर शिकायतें सामने आ रही हैं, जिसके चलते वहाँ रहने वाले विद्यार्थियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर हालात इतने बदतर हैं कि छात्रों को अपने बिस्तर और गद्दे हटाकर फर्श पर किसी तरह रात गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। विभागीय अधिकारियों को इस समस्या की पूरी जानकारी होने के बावजूद समय रहते मरम्मत कार्य नहीं कराए जाने से बच्चों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं।
बारिश में टपकती छत और बेहाल छात्र
यह ताजा मामला सरगुजा जिले के लखनपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत कुन्नी में संचालित प्री-मैट्रिक बालक छात्रावास का है। इस छात्रावास में लगभग 50 आदिवासी छात्र रहकर अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। जैसे ही बारिश शुरू होती है, छात्रावास की छत से पानी का रिसाव होने लगता है और पानी सीधे बच्चों के बिस्तरों पर टपकने लगता है। इसके कारण छात्रों को अपने बेड इधर-उधर खिसकाकर रात जगकर बितानी पड़ती है।
छात्रों का कहना है कि पिछले साल भी बरसात के मौसम में बिल्कुल ऐसी ही नारकीय स्थिति बनी हुई थी, लेकिन इसके बावजूद इस बार बरसात शुरू होने से पहले भवन की समुचित मरम्मत या वाटरप्रूफिंग का काम नहीं कराया गया।
एक अधीक्षक के पास तीन-तीन हॉस्टलों का प्रभार
छात्रावास की व्यवस्थाओं में लाचारी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रशासनिक लापरवाही के चलते कुन्नी छात्रावास के मुख्य अधीक्षक को एक साथ तीन अलग-अलग हॉस्टलों की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। अधीक्षक जोहन बंजारे का खुद कहना है कि उन्हें एक साथ तीन संस्थानों का प्रभार संभालना पड़ रहा है, और उन्होंने छत टपकने की समस्या से संबंधित जानकारी पहले ही उच्च अधिकारियों को दे दी थी।
इसके अलावा, इस छात्रावास परिसर में सुरक्षा के लिहाज से बाउंड्रीवाल का भी भारी अभाव है। ऐसे में रात के समय विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। यदि रात के वक्त कोई आपात स्थिति या अप्रिय घटना घटित हो जाती है, तो उसकी सीधी जिम्मेदारी किसकी होगी?
रसोई की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में
छात्रावास में बच्चों को परोसे जाने वाले भोजन की साफ-सफाई और हाइजीन की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। रसोईघर में साफ-सुथरे प्लेटफॉर्म या टेबल के बजाय फर्श पर बोरा बिछाया गया है और उसी के ऊपर बैठकर सब्जियाँ काटी जा रही हैं। इस तरह की अस्वच्छ परिस्थितियों के कारण बच्चों के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। यदि यही लापरवाही जारी रही, तो मासूम छात्र फूड पॉइजनिंग या अन्य गंभीर बीमारियों का शिकार हो सकते हैं।
अधिकारियों को जानकारी, फिर भी सुस्ती
हैरानी की बात यह है कि छात्रावास भवन की जर्जर हालत और छतों से पानी रिसने की पुख्ता जानकारी विभागीय अधिकारियों को पहले से ही है। अधीक्षक का कहना है कि भवन की दयनीय स्थिति को लेकर विभाग को लिखित पत्र भी भेजा जा चुका है, पर आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
मामले में आदिवासी विकास विभाग के सहायक संचालक ललित शुक्ला ने छात्रावास की बदहाल स्थिति की जानकारी होने की बात स्वीकार की है। उनका कहना है कि बरसात का मौसम बीतने के बाद भवन की मरम्मत कराई जाएगी। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विभाग को मानसून आने से पहले ही भवन की जर्जर स्थिति का पूरा इल्म था, तो समय रहते मरम्मत क्यों नहीं करवाई गई? अधिकारी का यह भी कहना है कि जो अधीक्षक हॉस्टलों में नियमित रूप से उपस्थित नहीं रहते, उनके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
कागजी दावे बनाम जमीनी हकीकत
सरकारी बैठकों और कागजी फाइलों में छात्रावासों की व्यवस्थाओं को हमेशा चाक-चौबंद दिखाया जाता है, लेकिन धरातल पर बच्चों की परेशानियाँ किसी से छिपी नहीं हैं। बरसात के इन दिनों में मासूम छात्र टपकती छतों के नीचे सोने को विवश हैं, रसोईघर की व्यवस्थाएं भगवान भरोसे हैं और कई हॉस्टलों में अधीक्षकों का नियमित रूप से मौजूद न होना प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोलता है। जिम्मेदारों की इस उदासीनता का खामियाजा आखिर कब तक इन आदिवासी विद्यार्थियों को भुगतना पड़ेगा?

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