August 12, 2026

संबल योजना में 25 लाख की गड़बड़ी, जांच करने वाली अधिकारी पर ही घोटाले में शामिल होने का आरोप

मऊगंज: मध्य प्रदेश की महत्वाकांक्षी 'संबल योजना', जिसे गरीब और बेसहारा परिवारों को संकट की घड़ी में आर्थिक संबल प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, मऊगंज जिले के हनुमना जनपद में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। 25 लाख रुपए के इस बहुचर्चित संबल घोटाले ने अब एक नया और चौंकाने वाला मोड़ ले लिया है, जहां प्रशासनिक जांच की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।

क्या है पूरा मामला?

मऊगंज जिले के हनुमना जनपद में गरीबों के हक पर डाका डालते हुए करीब 25 लाख रुपए के संबल घोटाले को अंजाम दिया गया। इस फर्जीवाड़े के तहत सामान्य मौतों को कागजों में 'एक्सीडेंटल डेथ' (दुर्घटना में मौत) दर्शाकर लाखों रुपए की सरकारी राशि की हेराफेरी कर ली गई। जब इस बड़े घोटाले का खुलासा हुआ, तो प्रशासनिक जांच के नाम पर जो खेल खेला गया, उसने पूरे तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

खुद ही जांचकर्ता और खुद पर ही मेहरबानी के आरोप

इस पूरे घोटाले में कुल चार प्रभारी सीईओ के कार्यकाल की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही थी। आरोप है कि जिस अधिकारी पर इस फर्जीवाड़े में शामिल होने के गंभीर आरोप थे, जांच का जिम्मा उसी अधिकारी को सौंप दिया गया। परिणाम यह निकला कि जांच अधिकारी ने खुद को और अपने साथी सीईओ को तो पूरी तरह क्लीन चिट दे दी, जबकि सारा ठीकरा मैदानी स्तर के कर्मचारियों और अन्य अधिकारियों के सिर फोड़ दिया गया।

कागजों की जादूगरी और भुगतान का खेल

सामने आए मामलों के मुताबिक, सामान्य मौतों को दुर्घटना जनित बताकर लाखों रुपए की राशि स्वीकृत करने और उनके भुगतान की प्रक्रिया में नियमों को ताक पर रखा गया। एक ओर जहां फाइल पास करने वाले अधिकारी को जांच में बेदाग बता दिया गया, वहीं दूसरी तरफ भुगतान प्रक्रिया से जुड़े अन्य कर्मचारियों को दोषी ठहरा दिया गया। इसी तरह के कई अन्य मामलों में भी सामान्य मौतों को एक्सीडेंटल बताकर योजना की निर्धारित राशि से अधिक का फर्जी भुगतान किए जाने के प्रमाण सामने आए हैं।

गरीबों के हक पर डाका और बली के बकरे

शिकायतकर्ताओं और स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहे हैं कि सरकार की जिस जनकल्याणकारी योजना का मकसद पीड़ित परिवारों को राहत देना था, वहां के प्रशासनिक तंत्र में बैठे जिम्मेदार लोगों ने गरीबों का हक डकार लिया। इस पूरे भ्रष्टाचार के खेल में कुछ छोटे कर्मचारियों और मैदानी अमले को तो कार्रवाई की जद में ले लिया गया, लेकिन नीतिगत निर्णय लेने वाले और डिजिटल सिग्नेचर से फंड जारी करने वाले मुख्य जिम्मेदार अधिकारी कागजी लीपापोती के चलते सुरक्षित बच निकले। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच करवाकर असली दोषियों पर क्या कार्रवाई करता है।