नई दिल्ली। राज्यसभा के मानसून सत्र में बीते डेढ़ हफ्ते से जारी गतिरोध का मुख्य कारण 'नियम 267' बना हुआ है। विपक्षी दल इसी नियम के तहत 20 जुलाई को छात्रों के विरोध-प्रदर्शन पर हुई पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर चर्चा कराने की मांग कर रहे हैं, जबकि सभापति इसे अस्वीकार कर रहे हैं।
36 वर्षों में केवल 11 बार ही हुई चर्चा
राज्यसभा के इतिहास में पिछले 36 सालों में 'नियम 267' के तहत केवल 11 बार ही चर्चा की अनुमति दी गई है। पूर्व सभापति शंकर दयाल शर्मा के कार्यकाल में 4 बार, भैरों सिंह शेखावत के कार्यकाल में 3 बार और हामिद अंसारी के कार्यकाल में 4 बार इस नियम के अंतर्गत बहस हुई। आखिरी बार वर्ष 2016 में नोटबंदी के मुद्दे पर इस नियम के जरिए चर्चा कराई गई थी। इससे पहले निर्भया कांड, बेमौसम बारिश और विदेश में काला धन जैसे गंभीर विषयों पर भी इस विशेष प्रावधान का इस्तेमाल किया गया था।
नियम 267 पर क्यों अड़ा है विपक्ष?
नियम 267 राज्यसभा की प्रक्रिया का एक असाधारण प्रावधान है। इसके तहत यदि सभापति अनुमति दे दें, तो उस दिन के सभी तय सरकारी और विधायी कामकाज रोककर केवल उसी विषय पर बहस कराई जाती है। इसके विपरीत, सामान्य 'नियम 176' में केवल ढाई घंटे की अल्पकालिक चर्चा का ही प्रावधान है। विपक्ष छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों का गंभीर हनन मानते हुए इसे दुर्लभ मामला बता रहा है, जबकि सभापति का कहना है कि स्थिति इतनी असाधारण नहीं है कि नियम 267 लागू किया जाए।

More Stories
संसद में प्रियंका गांधी की टिप्पणी पर बवाल, रिजिजू बोले- यह चरित्र हनन, माफी जरूरी
हरियाणा-पंजाब की सियासत गरमाई, पेपर लीक को लेकर नेताओं में जुबानी मुकाबला
प्रोफेसर वी. कामाकोटी पर सियासी विवाद, प्रियंका गांधी की टिप्पणी से मचा बवाल