नई दिल्ली। रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियों ने भारत की टेंशन को बढ़ा दी है। दोनों देश पिछले कुछ सालों में एक दूसरे के बहुत करीब आ गए हैं। हाल ही में इस्लामाबाद में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से निपटने के लिए रूस-पाकिस्तान वर्किंग ग्रुप की 12वीं बैठक हुई। इस बैठक में दोनों देशों के बीच आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। दोनों देश आतंकवाद विरोधी साझा सैन्य अभियानों को चलाने और सैन्य संबंधों को मजबूत करने पर भी सहमत हुए। इसे भारत के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मिलिट्री एनालिस्ट और पाकिस्तानी वायु सेना के पूर्व कर्नल सुल्तान एम ने कहा कि इस्लामाबाद में रूस-पाकिस्तान वर्किंग ग्रुप की बैठक को सिर्फ एक बार होने वाली घटना के तौर पर नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया के हिस्से के तौर पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह द्विपक्षीय फॉर्मेट उस कमी को पूरा करता है जिसे एससीओ और यूएन जैसे बहुपक्षीय मंच पूरा नहीं कर सकते। सुल्तान ने कहा कि पाकिस्तान सीरिया और उत्तरी काकेशस में रूस के आतंकवाद-विरोधी अनुभव को महत्व देता है, खासकर शहरी युद्ध, ड्रोन को रोकने और विद्रोह-विरोधी अभियानों में।
रूस के साथ सहयोग पाकिस्तान को एससीओ और यूएन में राजनीतिक समर्थन भी देता है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा में एक जिम्मेदार भागीदार के तौर पर उसकी छवि मजबूत होती है। निगरानी, साइबर सुरक्षा और काउंटर-ड्रोन सिस्टम में रूस की विशेषज्ञता पाकिस्तान की ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करती है। रूस और पाकिस्तान के सैन्य संबंध पिछले एक दशक में काफी मजबूत हुए हैं। यह साझेदारी मुख्य रूप से आतंकवाद विरोधी अभियानों, संयुक्त सैन्य अभ्यासों, रक्षा उपकरणों की बिक्री और क्षेत्रीय सुरक्षा पर विचारों के आदान-प्रदान पर केंद्रित है। 2014 में दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसने दशकों पुरानी शीत युद्ध की कड़वाहट को पीछे छोड़ते हुए सैन्य संबंधों का नया दौर शुरू किया था। रूस, पाकिस्तान को सीमित मात्रा में सैन्य हार्डवेयर बेचता है। इसमें 2017 में खरीदे गए एमआई-35एम अटैक हेलीकॉप्टर और जेएफ-17 के लिए रूसी इंजन आरडी-93 की आपूर्ति शामिल है।

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