75 लाख लोगों को मिला लाभ, पीएम स्वनिधि योजना ने बनाया रिकॉर्ड

नई दिल्ली। देश के असंगठित शहरी क्षेत्रों में रेहड़ी-पटरी पर व्यवसाय करने वाले लाखों छोटे कारोबारियों को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई 'प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि' (पीएम स्वनिधि) योजना ने अपने सफल छह वर्ष पूरे कर लिए हैं। जून 2020 में कोविड-19 महामारी के संकट काल के दौरान शुरू की गई इस योजना ने अब तक 75.5 लाख से अधिक स्ट्रीट वेंडर्स को सीधे तौर पर लाभान्वित किया है। इन छह वर्षों में योजना के तहत रेहड़ी-पटरी वालों को कुल 17,800 करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज वितरित किए जा चुके हैं, जिसने उनके व्यवसायों को पुनर्जीवित करने में संजीवनी का काम किया है।

डिजिटल लेनदेन और बैंक खातों को मिला बढ़ावा

आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के अनुसार, पीएम स्वनिधि योजना ने न केवल छोटे व्यापारियों को आर्थिक संबल दिया है, बल्कि देश में डिजिटल अर्थव्यवस्था को भी ग्रामीण और जमीनी स्तर पर मजबूत किया है। योजना के चलते सड़क किनारे दुकान लगाने वाले करीब 55 लाख से ज्यादा वेंडर्स डिजिटल रूप से ऑनबोर्ड हुए हैं। इन छोटे व्यापारियों ने अब तक कुल 8.96 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 841 करोड़ डिजिटल लेनदेन किए हैं। इस सराहनीय डिजिटल जुड़ाव के कारण लाभार्थियों को करीब 800 करोड़ रुपये तक की ब्याज सब्सिडी और डिजिटल कैशबैक का लाभ भी सीधे उनके बैंक खातों में मिला है।

तीन चरणों में बिना गारंटी मिलता है ऋण

इस योजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके तहत स्ट्रीट वेंडर्स को बिना किसी गारंटी के कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) के रूप में तीन आसान चरणों में कर्ज मिलता है। पहले चरण में 15,000 रुपये, दूसरे चरण में 25,000 रुपये और तीसरे चरण में 50,000 रुपये तक की ऋण सहायता प्रदान की जाती है। समय पर कर्ज का भुगतान करने वाले वेंडर्स की क्रेडिट लिमिट बढ़ा दी जाती है। डेटा के अनुसार, लगभग 95% लाभार्थियों ने अपने जीवन में पहली बार किसी औपचारिक बैंकिंग या संस्थागत माध्यम से ऋण प्राप्त किया है, जिससे उनकी सालाना औसत आय में 20% तक की वृद्धि दर्ज की गई है।

सामाजिक सुरक्षा और महिलाओं की भागीदारी

पीएम स्वनिधि योजना केवल ऋण देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लाभार्थियों को केंद्र सरकार की आठ अन्य प्रमुख सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से भी सीधे जोड़ा गया है। इस योजना का एक बड़ा सामाजिक पहलू यह है कि इसके कुल लाभार्थियों में 46% महिलाएं हैं, जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है। इसके अलावा, योजना के कुल लाभार्थियों में से 70% लोग समाज के वंचित और पिछड़े समुदायों से ताल्लुक रखते हैं। इस योजना की भारी सफलता और लोकप्रियता को देखते हुए केंद्र सरकार ने अब इसकी समय-सीमा को बढ़ाकर मार्च 2030 तक कर दिया है।

प्रशासनिक चुनौतियां और स्थायी ठिकाने का संकट

जमीनी स्तर पर भारी सफलता के बावजूद, इस योजना के सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी बनी हुई हैं। कई शहरों में वेंडर्स को आज भी अपना व्यापार करने के लिए स्थायी ठिकाना नहीं मिल पाता है, जिसके कारण उन्हें स्थानीय प्रशासन और नगर निगमों की बेदखली की कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, वर्तमान महंगाई के दौर में ठेले, उपकरण और वाहन आदि की लागत बढ़ने से कर्ज की यह राशि कई वेंडर्स को कम लगती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एक लोन को स्वीकृत होने में औसतन 23 दिन का समय लगता है, जो तत्काल वित्तीय जरूरत वाले छोटे दुकानदारों के लिए थोड़ा लंबा वक्त है।

सूदखोरों के चंगुल से मिली मुक्ति: विशेषज्ञ

इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (ISB), हैदराबाद के प्रोफेसर प्रसन्न तंत्री ने योजना के सकारात्मक प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लगभग 90 प्रतिशत स्ट्रीट वेंडर्स ने बिना किसी दबाव के अपने कर्ज का समय पर भुगतान किया है। इससे बैंकों में उनकी एक बेहतरीन क्रेडिट हिस्ट्री और क्रेडिट स्कोर तैयार हुआ है, जिसके दम पर अब उन्हें सामान्य वित्तीय संस्थानों से भी आसानी से लोन मिलने लगा है। इस योजना ने रेहड़ी-पटरी वालों को स्थानीय साहूकारों और सूदखोरों के चंगुल से परमानेंट मुक्ति दिलाई है। साथ ही, योजना के तहत मिलने वाले 'आइडेंटिटी कार्ड' ने उन्हें पुलिस और स्थानीय प्रशासन के उत्पीड़न से बचाकर सम्मान से कारोबार करने की एक नई पहचान दी है।