इन दिनों पितरों के प्रति कृतज्ञता और आस्था प्रकट करने वाला पितृ पक्ष चल रहा है. हरिद्वार के तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध के लिए श्रद्धालुओं की हलचल तेज हो गई है. श्रद्धा भाव से किए जाने वाले कर्म को श्राद्ध कहते हैं, जिससे भटकती आत्माओं को शांति मिलती है. पितृ मुक्ति के प्रमुख तीर्थों में हरिद्वार की प्राचीन नारायणी शिला का अलग महत्व है. स्कंद पुराण, वायु पुराण और गरुड़ पुराण समेत अनेक ग्रंथों के अनुसार, इस पवित्र शिला पर पितृ पक्ष के दौरान किया गया श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान पितरों को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करता है. भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले पितृ पक्ष में गया और बद्रीनाथ धाम के मुकाबले हरिद्वार की प्राचीन नारायणी शिला का माहात्म्य सर्वोपरि माना गया है. पौराणिक मान्यता के अनुसार गया में श्रीहरि के चरण और बद्रीनाथ में ललाट है, जबकि हरिद्वार की नारायणी शिला पर भगवान विष्णु के कंठ से नाभि तक का पवित्र वक्ष स्थल है. पितृ पक्ष के इन 16 दिनों में नारायणी शीला पर किया गया तर्पण और पिंडदान सीधे वैकुंठनाथ के हृदय तक पहुंचता है.
विष्णु का विग्रह स्वरूप
लोकल 18 से नारायणी शिला के मुख्य पंडित मनोज त्रिपाठी बताते हैं कि धार्मिक ग्रंथों में नारायणी शिला को साक्षात भगवान विष्णु के कंठ से लेकर नाभि तक का विग्रह स्वरूप माना गया है. भगवान का हृदय भी यही है, जिस कारण प्राचीन नारायणी शीला पर तर्पण का संकल्प सीधे भगवान नारायण के हृदय तक पहुंचता है. पंडित मनोज त्रिपाठी बताते हैं कि पूर्वजों के प्रेत योनि या दूसरी योनियों में भटकने पर अगर नारायणी शिला पर विधि-विधान से पिंडदान किया जाए तो भगवान विष्णु की कृपा से पितृ प्रेत योनि से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं.
जीते जी मिल जाएगा मोक्ष
पंडित मनोज त्रिपाठी के मुताबिक, महालय पक्ष के दौरान जो भी जातक पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ नारायणी शिला पर अपने पितरों का श्राद्ध कर्म करता है, उसके पितृ पक्ष की 100 पीढ़ियां और मातृ पक्ष की सभी 100 पीढ़ियां पितृ दोष से मुक्त हो जाती हैं. प्राचीन नारायणी शिला पर 100 पितृ कुल और 100 मातृ कुल के पूर्वजों को तृप्ति, सद्गति मिलने के साथ श्राद्ध करने वाले वंशजों को भी जीते जी पुण्य और मोक्ष का आशीर्वाद मिलाता है

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