पुरुषों से 4 गुना ज्यादा काम, फिर भी महिलाओं को साबित करनी पड़ती है काबिलियत

वाराणसी।महिलाओं को सशक्त करने से ज्यादा जरूरी समाज को शिक्षित करना है। समाज में अभी भी महिलाओं को पूरी तरह से बराबरी का दर्जा नहीं मिला है। विकसित भारत का मतलब विकसित नारी से है। इसके लिए समाज में जागरूकता जरूरी है। साथ ही हम महिलाएं पुरुषों की तुलना में 4 गुना अधिक काम कर सकती हैं। फिर भी हमें अपनी काबिलियत सिद्ध करनी पड़ती है।अलग-अलग क्षेत्रों से उच्च पदों पर तैनात महिलाओं ने रोजमर्रा के जीवन में उनके सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में बताया। साथ ही उन समस्याओं से कैसे निकलना है, इसके बारे में भी चर्चा की। महिलाओं ने कहा कि हमारे अंदर के मनोबल को बढ़ाने की जरूरत है। हमारे अंदर प्राकृतिक रूप से जो शक्तियां ईश्वर ने दे रखी हैं, उसे समझना पड़ेगा। जब हम खुद को मजबूत मानेंगे तो सामने आने वाली सभी चुनौतियों का सामना कर सकेंगे। पुरुषों की तुलना में महिलाएं चार गुना ज्यादा सक्षम हैं किसी भी काम को करने में। महिलाओं ने कहा कि समाज में आज भी जो बराबरी का दर्जा नहीं है, वह तभी मिलेगा जब साक्षरता बढ़ेगी। समाज में शिक्षित होने से ज्यादा महिलाओं को समझना जरूरी है।

महिला सशक्तीकरण की सिर्फ चर्चा है। हमेशा हम बाहरी पहलुओं को देखते हैं। हमारी क्षमता और प्रतिभा को हम जब तक खुद नहीं समझेंगे, तब तक सशक्त नहीं होंगे। समाज में अगर महिला काम कर रही है तो परिवार संभालने के लिए हमेशा उसे ही काम छोड़ने का दबाव दिया जाता है। इस सोच में बदलाव चाहिए।

पिछड़े इलाके की लड़कियां इंजीनियरिंग या डॉक्टर की पढ़ाई नहीं कर पा रही हैं, क्योंकि समाज में उनके लिए जगह नहीं बन पा रही है। हम महिलाएं पुरुषों की तुलना में 4 फीसदी अधिक काम कर सकती हैं। फिर भी हमें अपनी काबिलियत सिद्ध करनी पड़ती है।महिलाओं का इमोशनल टूल बहुत अच्छा होता है। इसका सही इस्तेमाल होना चाहिए। – मानसी दहिया, आईपीएस

समाज में अगर किसी के साथ भी कुछ गलत हो रहा है तो वह हमारी जिम्मेदारी है। समाज में 80 फीसदी लोग सामान्य शिक्षित या अशिक्षित हैं। 20 फीसदी विशेष वर्ग के लोग हैं। सबसे अधिक समस्या इसी वर्ग में है। इस वर्ग को समस्या उत्पन्न करना आता है। आज हमारा समाज जिस तरह से संस्कारविहीन होता दिख रहा है, यह आने वाले 10 वर्षों में पैंडेमिक होगा। – प्रो. मनीषा मेहरोत्रा, बीएचयू

महिलाओं की आधारभूत समस्याओं का समाधान होना चाहिए। कुछ बच्चियों को तो शिक्षा मिल पा रही है, संसाधन भी मिल रहे हैं, लेकिन जो सड़क पर गुजारा करती हैं, उनके लिए भी व्यवस्था होनी चाहिए। छोटी समस्याओं पर काम होगा तभी हम समाज में सुधार कर पाएंगे। – आरती शर्मा, सनबीम भगवानपुर

कोई भी महिला या पुरुष जब किसी भी पद पर होता है, उसमें परिवार का योगदान होता है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम जिस पद पर हैं उसका पूरी निष्ठा से निर्वहन करें। महिलाओं में एक-दूसरे के प्रति जलन की भावना होती है। हमें बदलाव अपने घर से ही करना होगा। बच्चों को भी सही परवरिश देनी होगी, जिससे वे आगे चलकर चीजों को समझ सकें। – सविता यादव, अपर नगर आयुक्त

महिलाओं को सोच बदलने की जरूरत है। वे पक्षपाती होती हैं। महिलाओं को अपनी काबिलियत समझनी होगी। महिला सशक्तीकरण की बात करना बंद कर पहले महिलाओं का आकलन करना बंद होना चाहिए। शिक्षित और जागरूक होना जरूरी है। उच्च पदों पर आसीन महिलाओं के चरित्र पर उंगली उठती है। इस सोच को भी बदलने की जरूरत है। – डॉ. आकांक्षा चौधरी, ट्रामा सेंटर बीएचयू

बेटियों की भ्रूण हत्या आज भी हो रही है। इसे रोकने की जरूरत है। इसके लिए सबसे अधिक जरूरी है कि लोग जागरूक हों। आजकल बच्चियां छोटे कपड़े पहन रही हैं, प्यार के चक्कर में पड़कर बर्बाद हो रही हैं। संन्यास के क्षेत्र में भी महिलाओं को तमाम परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। – साध्वी गीतांबा तीर्थ, साध्वी

किसी भी समस्या का समाधान सिर्फ राय देने से नहीं होता है। समाज तेजी से बदल रहा है। उन्नति में हम संस्कारविहीन होते जा रहे हैं। स्मार्टनेस में हम कुछ भी कर रहे हैं। घर हो या दफ्तर, महिलाओं को सिर्फ संसाधन की तरह इस्तेमाल किया जाता है। महिलाएं एक निपुण अर्थशास्त्री होती हैं। समाज में महिलाएं इतनी प्रताड़ित हैं कि खुद वकालत पढ़कर अपना मुकदमा लड़ रही हैं, फिर भी न्याय नहीं मिलता है। – सारिका दुबे, अधिवक्ता

महिलाएं आज के समय में पहले से अधिक सशक्त हैं, लेकिन महिलाएं ही महिलाओं को आगे बढ़ने नहीं देना चाहतीं। किसी महिला की यदि पदोन्नति हो तो सहकर्मी महिलाएं उससे द्वंद करती हैं। महिलाओं की रुचि कला में अधिक होती है। उनकी रचनात्मकता का कोई जोड़ नहीं है। अगर वे अपनी प्रतिभा का सही सम्मान करें तो उन्हें आगे बढ़ने से न तो समाज रोक सकता है और न ही कोई व्यक्ति। – प्रो. उत्तमा दीक्षित, बीएचयू

आज के समय में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि महिलाओं को समय नहीं मिल पा रहा है। भले ही महिला सशक्तीकरण की बात हो रही है, लेकिन सोचने का विषय है कि हम आधी आबादी की कितनी इज्जत कर रहे हैं। हमें निर्णय लेने का मौका मिलना चाहिए, जो इस समय नहीं मिलता। – चंदना यादव, राज्य हिंदी संस्थान

हम अपनी मेहनत की बदौलत ऊपर उठते हैं और कोई पद पाते हैं। फिर भी परिवार में समानता नहीं मिलती। समाज हमारे ज्ञान को किनारे रखता है। हमारी सोच बहुत स्ट्रांग होती है। हमारा बेस मजबूत होता है। समाज महिलाओं की ताकत को समझ नहीं पा रहा है। – प्रो. कैप्टन टी. ओनिमा रेड्डी, बीएचयू

महिलाओं के लिए एक सुरक्षित वातावरण बनाने की जरूरत है। बच्चियों को पढ़ने में समस्या है। उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पा रही है। ऐसी शिक्षा का कोई फायदा नहीं होगा, जिसे ग्रहण कर कोई काम न मिल सके। महिलाओं को आगे बढ़ाने की मंशा को पुरुषों को समझना पड़ेगा।– श्रुति नागवंशी, समाज सेवी