मैहर: मध्य प्रदेश के मैहर की पहचान केवल एक शहर के रूप में नहीं, बल्कि गहरी आस्था और रहस्यमयी इतिहास के रूप में होती है. मैहर नाम के पीछे भी एक अद्भुत मान्यता जुड़ी है. कहा जाता है कि यहां देवी मां का हार गिरा था, और इसी कारण इस स्थान का नाम मैहर पड़ा. शहर से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित त्रिकूट पर्वत की ऊंची चोटी पर विराजमान मां शारदा देवी का मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. जहां लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है.
पहाड़ की चोटी तक पहुंचने का सफर ही भक्ति की परिक्षा
मैहर में त्रिकूट पर्वत पर स्थित यह मंदिर जमीन से लगभग 600 मीटर ऊंचाई पर बना है. यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 1063 सीढ़ियों का कठिन सफर तय करना पड़ता है. यह यात्रा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक आस्था की परीक्षा भी मानी जाती है. जिस तरह वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा में कठिन चढ़ाई होती है, उसी तरह मैहर की चढ़ाई भी भक्तों के विश्वास को और मजबूत करती है. हालांकि अब आधुनिक समय में रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे बुजुर्ग और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को राहत मिलती है.
विक्रम संवत 559 की मूर्ति ,इतिहास या रहस्य
मां शारदा मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण यहां स्थापित वह प्राचीन मूर्ति है जिसकी स्थापना विक्रम संवत 559 में मानी जाती है. यह मूर्ति करीब 1500 साल पुरानी बताई जाती है और इसके साथ कई रहस्य जुड़े हुए हैं. मूर्ति पर देवनागरी लिपि में शिलालेख अंकित हैं जो इसके ऐतिहासिक महत्व को प्रमाणित करते हैं. प्रसिद्ध पुरातत्वविद् ए कनिंघम ने भी इस स्थल पर अध्ययन किया था और जिससे इसकी ऐतिहासिक विश्वसनीयता और बढ़ जाती है. इतिहास और आस्था का यह संगम इस मंदिर को खास बनाता है, जिससे आस्था का अटूट रिश्ता बनता जा रहा है.
समय के साथ बदलता मंदिर, बढ़ती जा रही आस्था
मैहर में मां शारदा मंदिर का इतिहास 6वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ माना जाता है. शुरुआत में यह एक छोटा और कठिन पहुंच वाला स्थान था, जिसके बाद वर्ष 1918 तक मंदिर सीमित स्वरूप में था और वर्ष 1951 में यहां सीढ़ियों का निर्माण हुआ. इसके बाद श्रद्धालुओं की संख्या तेजी से बढ़ने लगी आज यह मंदिर एक विशाल धार्मिक केंद्र बन चुका है जहां प्रतिदिन हजारों लोग दर्शन के लिए आते हैं और मां के सामने शीश झुकते हैं.
नवरात्रि में उमड़ता है आस्था का सैलाब
मैहर में चैत्र और क्वार नवरात्रि के दौरान विशेष धार्मिक माहौल देखने को मिलता है. इन दिनों यहां विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं. नवरात्रि के पहले दिन मां का विशेष श्रृंगार किया जाता है और सुबह से ही दर्शन के लिए लंबी कतारें लग जाती हैं. पूरा शहर भक्ति और उत्सव में डूब जाता है.
सुबह 4 बजे से शुरू होती है मां की सेवा
मैहर मां शारदा मंदिर में प्रतिदिन पूजा-अर्चना का क्रम बेहद अनुशासित तरीके से चलता है. सुबह 4 बजे मां की आरती और भजन इसके बाद भव्य श्रृंगार और महाभोग शाम 8 :30 बजे आरती के साथ दिन का समापन भक्तजन नारियल, चुनरी, सिंदूर, पान-सुपारी जैसे प्रसाद अर्पित कर मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.
आल्हा-उदल आज भी करते हैं प्रथम पूजा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, वीर योद्धा आल्हा और उदल मां शारदा के परम भक्त थे. कहा जाता है कि उन्होंने ही इस मंदिर की खोज की और यहां 12 वर्षों तक तपस्या की. आज भी यह मान्यता प्रचलित है कि मां के पहले दर्शन आल्हा ही करते हैं मंदिर के पास स्थित आल्हा तालाब और अखाड़ा इस कथा को जीवंत बनाए हुए हैं जिससे लोग देखते हैं.मंदिर के प्रधान पुजारी पवन पाण्डेय द्वारा बताया गया कि, ''मां शारदा मंदिर में आज भी आल्हा आते हैं. इसके कई प्रमाण भी मिलते हैं जो कि अलग अलग हैं. कलयुग में मां शारदा के दर्शन मात्र से सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं. इस तरह की परंपरा कई वर्षों से लगातार चली आ रही है.''
'मां का हार' और सती की कथा से जुड़ी पहचान
मंदिर की पौराणिक कथा के अनुसार, दक्ष प्रजापति की पुत्री सती ने भगवान शिव से विवाह किया था. एक यज्ञ के दौरान अपमानित होकर सती ने अपने प्राण त्याग दिए. इसके बाद भगवान विष्णु ने सती के शरीर को कई भागों में विभाजित किया, जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ बने. मान्यता है कि मैहर में सती का हार गिरा था, जिससे इस स्थान का नाम 'मैहर' पड़ा है.
आस्था और इतिहास का जीवंत संगम
मैहर का मां शारदा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आस्था, इतिहास और रहस्य का अद्भुत संगम है. 1500 साल पुरानी मूर्ति, उससे जुड़ी मान्यताएं और आज भी जीवित परंपराएं इस स्थान को विशेष बनाती हैं. यही कारण है कि देशभर से श्रद्धालु यहां खिंचे चले आते हैं और मां के दरबार में अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं.

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