नई दिल्ली। पश्चिम एशिया के रेगिस्तान में गिरते मिसाइल और गरजते लड़ाकू विमानों की गूंज अब भारतीय वायुसेना के बेड़े में सन्नाटा पैदा कर रही है। यह महज एक संयोग नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध का वह क्रूर चेहरा है जहां सीमाएं आपस में जुड़ी नहीं होतीं, फिर भी एक देश की जंग दूसरे देश की सुरक्षा तैयारियों को बंधक बना लेती है। इजरायल-ईरान के बीच छिड़ा महायुद्ध भारत के स्वदेशी फाइटर जेट तेजस मार्क-1ए के लिए एक ऐसा अदृश्य अवरोध बन गया है, जिसने रक्षा गलियारों में चिंता की लकीरें खींच दी हैं। यह संकट अब केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की कॉम्बैट स्ट्रेंथ (युद्धक क्षमता) पर सीधा प्रहार है।
भारतीय वायुसेना वर्तमान में लड़ाकू विमानों की अपनी स्वीकृत संख्या (42 स्क्वाड्रन) के मुकाबले बेहद कम स्तर पर काम कर रही है। इस गैप को भरने के लिए स्वदेशी तेजस मार्क-1ए को गेम-चेंजर माना गया था। 180 विमानों का भारी-भरकम ऑर्डर एचएएल के पास है, लेकिन हकीकत यह है कि मार्च 2024 की डेडलाइन बीत जाने के बावजूद वायुसेना के हाथ अब तक खाली हैं। इस देरी की सबसे बड़ी और कड़वी वजह यह है कि तेजस का दिल (अमेरिकी इंजन) और उसकी आंखें (इजरायली रडार) दोनों ही इस वक्त युद्ध के मैदान में उलझे हुए हैं। अमेरिकी कंपनी जीई जो तेजस को एफ-404 इंजन सप्लाई करती है, वह इस समय वॉशिंगटन और यरूशलेम के रणनीतिक दबाव में है। यूक्रेन और मिडिल-ईस्ट के मोर्चों पर अमेरिकी लड़ाकू विमानों की बढ़ती सक्रियता के कारण जीई ने भारत को इंजन देना लगभग बंद कर दिया है। पिछले 90 दिनों से भारत को एक भी इंजन प्राप्त नहीं हुआ है, जबकि वादा हर महीने दो इंजन देने का था। अमेरिकी कंपनियां इस समय अपने घरेलू और इजरायली ऑर्डर्स को वॉर-प्रायोरिटी पर रख रही हैं, जिसका सीधा मतलब है कि भारत का प्रोजेक्ट उनकी प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे खिसक गया है।
यही हाल इजरायली रडार सिस्टम का भी है। तेजस को दुनिया का सबसे घातक लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट बनाने वाला इजरायली ईएल/एम-2052 एईएसए रडार अब इजरायल की अपनी रक्षा जरूरतों के लिए रिजर्व कर लिया गया है। इजरायल इस समय अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, ऐसे में उसकी कंपनियां भारत को रडार सप्लाई करने के बजाय अपनी सेना के लिए रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम बनाने में जुटी हैं। यह स्थिति भारत के लिए एक कड़वा वेक-अप कॉल है। यह साबित हो गया है कि वैश्विक अस्थिरता के दौर में ग्लोबल सप्लाई चेन पर निर्भरता कितनी जोखिम भरी हो सकती है। जब दुनिया की महाशक्तियां जंग में उलझती हैं, तो वे अपने सहयोगियों के साथ हुए व्यापारिक करारों को दरकिनार करने में संकोच नहीं करतीं। भारत का तेजस प्रोजेक्ट इस समय उसी कोलेटरल डैमेज का शिकार हो रहा है, जो किसी भी समय हमारी वायुसेना की मारक क्षमता को कमजोर कर सकता है।

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