मंदसौर. आज धनतेरस है और मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित कुबेर मंदिर अपनी अनोखी परंपरा और चमत्कारी मान्यताओं के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है. यह मंदिर शहर से तीन किलोमीटर दूरी पर खिलचीपुरा गांव में स्थित है. मान्यता के अनुसार देश में दो ही ऐसे मंदिर है जहां भगवान कुबेर शिव परिवार के साथ विराजमान हैं. जिसमें से एक मंदिर मध्यप्रदेश के मंदसौर के मौजूद है. इस मंदिर में कुबेर देव के साथ धोलागिरी महादेव, माता पार्वती, गणेश सहित पूरे शिव परिवार की प्रतिमा विराजित है. यही कारण है कि यह मंदिर भारत का इकलौता ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां कुबेर देव की पूजा शिव परिवार के साथ होती है. आज धनतेरस के शुभ अवसर पर यहां सुबह से ही भक्तों का तांता लगा है.
इतिहासकारों के अनुसार मंदिर में स्थापित कुबेर की मूर्ति करीब 1300 साल पुरानी है. यह उत्तर गुप्त काल की 7वीं शताब्दी की बताई जाती है. भगवान कुबेर चतुर्भुज रूप में नेवले पर सवार हैं. उनके एक हाथ में धन की पोटली, एक हाथ में प्याला और दो हाथों में शस्त्र हैं. मंदिर का निर्माण मराठा शासनकाल में हुआ माना जाता है. इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके गर्भगृह में आज तक कभी ताला नहीं लगाया गया. पहले तो मंदिर में दरवाजा तक नहीं था. गर्भगृह का दरवाजा महज तीन फीट का है, जिसमें से भक्त सिर झुकाकर, बिना पीठ दिखाए दर्शन कर बाहर निकलते हैं.
वहीं, स्थानीय मान्यता के अनुसार यह मंदिर बनाया नहीं गया, बल्कि यतियों द्वारा उड़ाकर लाया गया था. यही कारण है कि इस मंदिर की कोई नींव नहीं है. लोग मानते हैं कि मंदिर के आने के दौरान रास्ते में खजाना भी बिखरा होगा. आज दिपावली पर्व के धनतेरस पर्व पर इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी है. मान्यता है कि आज के दिन यहां दर्शन करने से कभी धन-दौलत की कमी नहीं होती.
अपनी तिजौरी में श्री कुबेर धाम की मिट्टी ले जाकर रखते हैं लोग
धनतेरस के दिन सुबह 4 बजे यहां विशेष तंत्र पूजा होती है, इसके बाद ही भक्तों को दर्शन का मौका मिलता है. आर्थिक परेशानी से जूझ रहे लोग यहां आकर कुबेर देव और शिव परिवार से सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांग रहे हैं. कई भक्त यहां की मिट्टी ले जाकर अपनी तिजोरी में रखते हैं, ऐसी मान्यता है कि इससे तिजोरी कभी खाली नहीं होती और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है.

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