November 1, 2026

अमेरिका में चुनावी हार का डर, ईरान पर सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं ट्रंप?

वाशिंगटन। अमेरिका में आयोजित होने वाले आगामी मिडटर्म चुनावों से ठीक पहले अमेरिका और ईरान के बीच गहराते सैन्य संघर्ष को लेकर एक नई रिपोर्ट सामने आई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चुनावों के नतीजों के बाद ईरान के खिलाफ एक बार फिर बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू करने पर विचार कर रहे हैं।

चुनावी नतीजों और सैन्य रणनीति का संबंध

एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि यदि इन चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है, तो ट्रंप ईरान के खिलाफ और अधिक सख्त रुख अपनाते हुए कड़े सैन्य हमलों के आदेश दे सकते हैं। हालांकि, व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि चुनावी परिणाम राष्ट्रपति के रणनीतिक निर्णयों को प्रभावित नहीं करेंगे। दूसरी ओर, फ्लोरिडा की चुनावी रैलियों और एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि यह टकराव अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकता है और अमेरिका दोबारा 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' जैसा अभियान चला सकता है।

शीर्ष सैन्य अधिकारियों की ब्रीफिंग

संभावित सैन्य विकल्पों पर चर्चा के बीच अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर, रक्षा मंत्री और जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष ने व्हाइट हाउस का अचानक दौरा किया। इन सैन्य प्रमुखों ने राष्ट्रपति को चुनावों के बाद ईरान के विरुद्ध दोबारा व्यापक कार्रवाई करने के विभिन्न विकल्पों पर विस्तृत जानकारी दी। इसके साथ ही, अमेरिकी प्रशासन ने खाड़ी देशों के नेताओं को भी चुनावों के बाद एक छोटे लेकिन भीषण सैन्य अभियान के लिए तैयार रहने का कूटनीतिक संदेश भेजा है।

घरेलू राजनीति, आर्थिक खर्च और रणनीतिक लक्ष्य

यह संघर्ष अमेरिका के घरेलू राजनीतिक गलियारों में राष्ट्रपति के लिए एक बड़ी चुनौती बन रहा है। पेंटागन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस युद्ध के शुरुआती साढ़े सात महीनों में ही 47 अरब डॉलर से अधिक का सरकारी फंड खर्च हो चुका है। वहीं, एक सर्वे में केवल 35 प्रतिशत पंजीकृत मतदाताओं ने ही ईरान नीति का समर्थन किया है। वाशिंगटन का मुख्य लक्ष्य जहां ईरान को परमाणु हथियार संपन्न बनने से रोकना है, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है।