October 27, 2026

प्रशासनिक रुतबे से सियासी ताकत तक का सफर, क्या चुनाव में जनता का भरोसा जीत पाएंगे पूर्व अफसर?

नई दिल्ली। आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के बीच राजनीति में अपनी सियासी जमीन तलाशने और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पूर्व नौकरशाहों के मैदान में उतरने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। पिछले कुछ ही हफ्तों के अंतराल में कई पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों ने या तो अपनी नई राजनीतिक पार्टियों के गठन का ऐलान किया है अथवा विभिन्न स्थापित दलों का दामन थामकर चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश में जुट गए हैं। हालांकि, उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास पर यदि नजर डाली जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक सेवा से जुड़े अधिकारियों को राजनीति में वह मुकाम हासिल नहीं हुआ जिसकी उन्हें अपेक्षा रहती है। कई मामलों में तो ऐसा भी देखा गया है कि जो अधिकारी कभी संबंधित जिलों के जिलाधिकारी या कमिश्नर के रूप में पदस्थ रहे, उन्हें चुनावी मैदान में उतरने पर जनता ने सिरे से नकार दिया।

नए दलों का गठन और राजनीतिक दलों में शामिल होने की होड़

हाल ही में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के पूर्व निदेशक नागेश्वर राव ने 'सर्वजन समाज पार्टी' नामक नए राजनीतिक दल के गठन की घोषणा की है। इससे पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा की पूर्व अधिकारी दिव्या मित्तल ने 'जन नीति भारत पार्टी' बनाने का ऐलान करते हुए आगामी चुनावों में अपनी किस्मत आजमाने के संकेत दिए हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में आधा दर्जन से अधिक सेवानिवृत्त आईएएस, आईपीएस और पीसीएस अधिकारी सक्रिय राजनीति में उतरकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कर सकते हैं। इसके अलावा कई पूर्व अधिकारी विभिन्न दलों में रहकर पर्दे के पीछे से चुनावी रणनीतियां तैयार करने में व्यस्त हैं।

पुराना चुनावी इतिहास गवाह, नौकरशाहों को नहीं मिली अपेक्षित राजनीतिक सफलता

पूर्व का राजनीतिक पटल गवाह है कि प्रशासनिक पृष्ठभूमि से आने वाले कई दिग्गजों ने अपने राजनीतिक दल बनाए, किंतु वे जनता का भरोसा जीतने में विफल रहे। उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में भ्रष्ट अधिकारियों को चिह्नित करने का अभियान चलाने वाले पूर्व आईएएस विजय शंकर पांडेय ने 'लोकगठबंधन पार्टी' का गठन कर फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें ढाई हजार वोट भी नसीब नहीं हुए, जबकि वह उसी जिले में जिलाधिकारी के पद पर अपनी सेवाएं दे चुके थे। इसी प्रकार पूर्व आईएएस चंद्रपाल ने 'आदर्श समाज पार्टी' बनाई, पूर्व गृह सचिव हरीश चंद्रा ने 'राष्ट्रीय जनवादी पार्टी क्रांतिकारी' की स्थापना की, और गोंडा के पूर्व जिलाधिकारी राम बहादुर ने 'नागरिक एकता पार्टी' बनाई, लेकिन वे भी चुनाव जीतने में सफल नहीं हो पाए। पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह ने बुंदेलखंड राज्य के मुद्दे पर 'बुंदेलखंड लोकतांत्रिक पार्टी' बनाई परंतु चुनाव लड़ने से दूरी बनाए रखी।

स्थापित राजनीतिक दलों का दामन थामने वाले अधिकारियों का सफर

केवल अपनी पार्टियां बनाने तक ही यह दौड़ सीमित नहीं है, बल्कि कई पूर्व नौकरशाह बड़े दलों के साथ जुड़कर भी अपनी राजनीतिक जमीन तलाशते नजर आए हैं। पूर्व आईएएस अधिकारी राम बहादुर और प्रमुख सचिव गृह रह चुके कुंवर फतेह बहादुर, जो कभी बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती के करीबी माने जाते थे, बाद में समाजवादी पार्टी के खेमे में शामिल हो गए। इसी प्रकार पूर्व आईएएस प्रवीण प्रकाश ने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली है। इसके विपरीत कुछ ऐसे अधिकारी भी रहे जिन्हें बड़े दलों में शामिल होने के बावजूद चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिला, जिनमें आईएएस एसडी वागला का भाजपा में शामिल होना और राय सिंह का कांग्रेस का रुख करना शामिल है। इसके अलावा बादल चटर्जी और एस के वर्मा जैसे प्रशासनिक अधिकारी भी चुनावी अखाड़े में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक पृष्ठभूमि से राजनीति में आने वाले चेहरों के लिए जनसमर्थन हासिल करना हमेशा से एक कठिन चुनौती रहा है।