October 23, 2026

खंडहरों में छिपा है राजस्थान का गौरवशाली इतिहास; बसंतगढ़ के सूर्य मंदिर और 1400 साल पुराने शिलालेख की कहानी

राजस्थान के सिरोही जिले के बसंतगढ़ गांव का प्राचीन सूर्य मंदिर राज्य के पुराने सूर्य मंदिरों में से एक है. जिले के वरमान स्थित 7वीं शताब्दी के सूर्य मंदिर के बाद इस मंदिर का निर्माण हुआ था. यहां 625 ईस्वी का प्राचीन शिलालेख भी मिला था, जो इस क्षेत्र के इतिहास और धार्मिक गतिविधियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देता है.

पिंडवाड़ा कस्बे से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित बसंतगढ़ गांव में बना सूर्य मंदिर क्षेत्र के प्राचीन मंदिरों में से एक है. स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, मंदिर का इतिहास करीब दो हजार वर्ष पुराना बताया जाता है. बसंतगढ़ में मिले 625 ईस्वी के शिलालेख का संबंध राजा वरमलात के शासनकाल से था. इसमें अर्बुद क्षेत्र के सामंत राज्जिल और उस समय की धार्मिक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है. बसंतगढ़ को प्राचीन समय में वटपुर नाम से भी जाना जाता था. यह अभिलेख क्षेत्र की राजनीतिक और धार्मिक स्थिति को समझने में मदद करता है. यहां आसपास अचलगढ़ किले के अवशेष, लाहिनी बावड़ी और ब्रह्मा मंदिर भी स्थित हैं.
शिलालेख में पहली बार मिला था ‘राजस्थानी’ शब्द का उल्लेख
इतिहासकार डॉ. उदयसिंह डिंगार के अनुसार, बसंतगढ़ में मिले शिलालेख में ‘राजस्थानीयादित्य’ शब्द का उल्लेख मिलता है. इसे पुराने समय में ‘राजस्थान’ शब्द के शुरुआती प्रयोगों में से एक माना जाता है. वर्ष 625 ईस्वी में इस पूरे क्षेत्र पर चापवंशीय राजा वरमलात का शासन था. उनके सामंत राज्जिल आबूराज क्षेत्र का संचालन करते थे. बाद में महाराणा कुंभा ने बसंतगढ़ पर विजय हासिल कर यहां बसंति दुर्ग बनवाया था. इसी दुर्ग के नाम पर क्षेत्र का नाम बसंतगढ़ पड़ा. आज भी यहां किले की दीवारों के अवशेष दूर-दूर तक पहाड़ी पर नजर आते हैं.

खंडहरों में तब्दील हो चुका है मंदिर और बसंतगढ़
समय के साथ बसंतगढ़ का प्राचीन इतिहास धीरे-धीरे गुमनाम होता गया. स्थानीय मान्यताओं और विवरणों के अनुसार, विदेशी आक्रमणों के दौरान यहां के मंदिरों को नुकसान पहुंचा और लूटपाट भी हुई. बताया जाता है कि महमूद गजनवी और अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमणों के दौरान मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया, जिससे सूर्य मंदिर का गुंबद और मूर्तियां भी खंडित हो गईं. स्थानीय बुजुर्ग किशन सिंह के अनुसार, बसंतगढ़ के सूर्य मंदिर की पहचान इसकी पारंपरिक पत्थर की बनावट और शिल्पकारी से जुड़ी है. इसके अवशेष प्राचीन मंदिर निर्माण शैली की झलक देते हैं. समय के साथ मंदिर की संरचना को काफी नुकसान पहुंचा है, लेकिन बचे हुए स्थापत्य अवशेष आज भी इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए महत्वपूर्ण हैं. वर्तमान में यह मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन संरक्षित है.