देहरादून। प्रकृति की बेहद खूबसूरत और हसीन वादियों के आगोश में बसे देहरादून का सुकून कभी पूरी तरह अलग और अनूठा हुआ करता था, लेकिन आधुनिक विकास की अंधी दौड़ और शहर के बढ़ते शोरगुल के बीच अब वह सुकून कहीं पीछे छूटता जा रहा है। धड़ल्ले से कटते जा रहे हरे-भरे पेड़, अनियंत्रित शहरीकरण और कंक्रीट के जंगलों में बदलते शहर के बीच आज की युवा पीढ़ी उस पुरानी और शांत दून की संस्कृति को धीरे-धीरे भूलती जा रही है, जो कभी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आत्मीयता के लिए देश-दुनिया में पहचानी जाती थी।
दून की असली पहचान और प्राकृतिक धरोहर
शहर के चारों तरफ दूर-दूर तक फैले सघन जंगल, शांत और ऊंचे पहाड़, इतिहास समेटे पुराने गांव तथा सदियों पुरानी पथरीली पगडंडियां ही इस दून घाटी की असल और मौलिक पहचान का सबसे अहम हिस्सा रही हैं। आधुनिकता की चकाचौंध में भले ही शहर का स्वरूप बदल गया हो, लेकिन इन प्राचीन रास्तों, जंगलों और उनसे जुड़ी अनकही लोककथाओं को सहेजने तथा उन्हें फिर से तलाशने का एक अनूठा जुनून आज के दून के युवाओं के दिलों में जाग उठा है, जो उन्हें एक मंच पर एकजुट कर रहा है।

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