जयपुर: पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के बीच शुरू हुआ ताजा राजनीतिक विवाद ऊपर से भले ही दो नेताओं के बीच आपसी मतभेद और संगठन संचालन को लेकर असहमति का मामला नजर आता हो, लेकिन इस तरह के टकराव हमेशा इससे कहीं बड़े राजनीतिक सवाल की ओर इशारा करते हैं। राजस्थान की सियासत का इतिहास ऐसे अनगिनत उदाहरणों से पूरी तरह भरा पड़ा है। चाहे कांग्रेस पार्टी हो या भारतीय जनता पार्टी, जब-जब केंद्रीय नेतृत्व (हाईकमान) अपेक्षाकृत कमजोर पड़ा या पार्टी पर उसका नियंत्रण कुछ ढीला हुआ, तब-तब प्रदेश के मजबूत और प्रभावशाली राजनीतिक क्षत्रपों ने अपने प्रभाव और ताकत के दम पर खुलकर अपनी आवाज बुलंद की है। राजस्थान की राजनीति ने ऐसे कई दौर देखे हैं जब संगठन, सरकार और प्रभावशाली नेताओं के बीच शक्ति संतुलन को लेकर खुलकर खींचतान सामने आई, जिसका सीधा असर पार्टी के आंतरिक समीकरणों से लेकर चुनावी परिणामों तक देखने को मिला।
ताजा घटनाक्रम के तहत विश्वेंद्र सिंह ने स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान टिकट वितरण और संगठन की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के इस्तीफे की मांग कर डाली। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ने का खुला ऐलान किया, जिसके जवाब में पार्टी ने उन्हें अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। कांग्रेस संगठन का आरोप है कि उन्होंने गंभीर अनुशासनहीनता की है और पार्टी की गतिविधियों से लगातार दूरी बनाई रखी है।
कांग्रेस पार्टी के भीतर लंबे समय से चली आ रही आंतरिक खींचतान का इतिहास
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वर्ष 1998: मदेरणा बनाम गहलोत – मुख्यमंत्री पद को लेकर पहला बड़ा संघर्ष राज्य में कांग्रेस पार्टी की सत्ता में वापसी के बाद परसराम मदेरणा समेत कई वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे माने जा रहे थे। हालांकि, अंत में अशोक गहलोत को राज्य का मुख्यमंत्री चुना गया। इस फैसले के साथ ही प्रदेश में नेतृत्व को लेकर पहले बड़े शक्ति-संतुलन और खींचतान की नींव पड़ी। आने वाले वर्षों में सरकार और संगठन के बीच वर्चस्व को लेकर चर्चाएं अक्सर होती रहीं।
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वर्ष 2002-03: गिरिजा व्यास के कार्यकाल में सरकार और संगठन के बीच तालमेल का संकट विभिन्न उपचुनावों में कांग्रेस पार्टी के बेहद खराब प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व और प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे। सरकार और पार्टी संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए आखिरकार केंद्रीय हाईकमान को विशेष रूप से एक समन्वय समिति का गठन कर सीधे तौर पर हस्तक्षेप करना पड़ा। उस दौरान विवाद का मुख्य केंद्र यह था कि चुनावी हार-जीत की नैतिक जिम्मेदारी आखिर सरकार की होनी चाहिए या संगठन की।
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वर्ष 2004: नारायण सिंह के दौर में निकाय चुनावों में हार के बाद घमासान वर्ष 2004 के स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस को मिली करारी शिकस्त के बाद एक बार फिर सरकार और संगठन के बीच जिम्मेदारी तय करने को लेकर आपसी खींचतान शुरू हो गई। उस समय राजस्थान में भाजपा की वसुंधरा राजे बतौर मुख्यमंत्री सत्ता की मुख्य कमान संभाल रही थीं। हालांकि, प्रदेश अध्यक्ष नारायण सिंह के कार्यकाल के दौरान भी यह तीखा सवाल उठाया गया था कि क्या सरकार ने सत्ता का दुरुपयोग करते हुए निकाय चुनावों के नतीजों को प्रभावित किया है।
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वर्ष 2008: सीपी जोशी और अशोक गहलोत के बीच मुख्यमंत्री पद की दावेदारी विधानसभा चुनावों के दौरान तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सीपी जोशी को मुख्यमंत्री पद का सबसे प्रमुख दावेदार माना जा रहा था। हालांकि, नाथद्वारा विधानसभा सीट पर मात्र एक वोट के अंतर से उनकी अप्रत्याशित हार के बाद मुख्यमंत्री पद की पूरी तस्वीर ही बदल गई और अशोक गहलोत एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुए। यहाँ मुख्य विवाद चुनावी हार से ज्यादा नेतृत्व के अगले चेहरे को तय करने को लेकर था।
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वर्ष 2018-20: गहलोत-पायलट विवाद – मुख्यमंत्री पद और सत्ता में हिस्सेदारी का बड़ा संघर्ष वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों में टिकट वितरण की प्रक्रिया को लेकर पार्टी के दोनों प्रमुख खेमों के बीच गहरे मतभेद सामने आए थे। चुनाव के बाद जब कांग्रेस की सरकार बनी, तो मुख्यमंत्री पद को लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट आमने-सामने आ गए। एक राजनीतिक समझौते के तहत अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री और सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन इसके बावजूद सत्ता और संगठन में अपने प्रभाव को बढ़ाने की खींचतान लगातार जारी रही। परिणामस्वरूप, जुलाई 2020 में सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग रुख अपनाकर मानेसर चले गए। इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद उन्हें उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दोनों ही महत्वपूर्ण पदों से हटा दिया गया।
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वर्ष 2022: मुख्यमंत्री बदलने की सुगबुगाहट और चरम पर पहुँचा गहलोत-पायलट विवाद अशोक गहलोत के राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की संभावनाओं के बीच राजस्थान में नया मुख्यमंत्री चुने जाने की चर्चाएं अचानक तेज हो गईं। सचिन पायलट को राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनाए जाने की अटकलों के बीच गहलोत खेमे के लगभग 90 विधायकों ने एक समानांतर बैठक बुलाई और विधानसभा अध्यक्ष को अपने सामूहिक इस्तीफे सौंपने की पेशकश कर दी। इस नाटकीय घटनाक्रम ने यह पूरी तरह साफ कर दिया कि यह विवाद केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का नहीं था, बल्कि राज्य की सत्ता पर नियंत्रण और केंद्रीय हाईकमान के किसी भी फैसले को स्वीकार करने या न करने के बड़े सवाल तक पहुँच चुका था।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) का आंतरिक राजनीतिक परिदृश्य भी इससे अछूता नहीं रहा
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वर्ष 2012: वसुंधरा राजे बनाम गुलाबचंद कटारिया का आंतरिक टकराव वरिष्ठ नेता गुलाबचंद कटारिया की प्रस्तावित मेवाड़ यात्रा को लेकर पार्टी के भीतर राजे खेमे से तीखा विवाद पैदा हो गया था। उस समय वसुंधरा राजे ने पार्टी छोड़ने तक की चेतावनी दे डाली थी और उनके समर्थन में राज्य के 40 से अधिक प्रमुख नेताओं व विधायकों ने अपने इस्तीफे देने की पेशकश कर दी थी। बढ़ते राजनीतिक दबाव के चलते आखिरकार गुलाबचंद कटारिया को अपनी वह यात्रा वापस लेनी पड़ी थी।
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वर्ष 2013: वसुंधरा राजे के नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर मुखर विरोध विधानसभा चुनावों से ठीक पहले भाजपा के भीतर ही वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद का आधिकारिक चेहरा बनाए जाने को लेकर गहरे मतभेद उभरकर सामने आए। घनश्याम तिवाड़ी समेत पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता राजे के नेतृत्व को लेकर अपनी अलग और स्पष्ट राय रखते थे। हालांकि, चुनाव जीतने के बाद वसुंधरा राजे प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन इसके बाद भी घनश्याम तिवाड़ी लगातार सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे।
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वर्ष 2014: लोकसभा चुनाव के दौरान जसवंत सिंह की खुली बगावत आम चुनावों के दौरान बाड़मेर संसदीय सीट से टिकट मिलने को लेकर वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के बीच विवाद जगजाहिर हो गया। पार्टी ने उनके स्थान पर कांग्रेस से आए कर्नल सोनाराम को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। इससे आहत होकर जसवंत सिंह ने पार्टी के फैसले के खिलाफ जाकर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा।
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वर्ष 2003: देवी सिंह भाटी का भाजपा से मोहभंग और 'सामाजिक न्याय मंच' का गठन वसुंधरा राजे के राजनीतिक उभार से काफी पहले ही भाजपा के भीतर असंतोष का एक बड़ा उदाहरण देवी सिंह भाटी के रूप में सामने आया था। आरक्षण नीति के वैचारिक मुद्दों पर पार्टी नेतृत्व से सीधा टकराव होने के बाद सितंबर 2003 में उन्हें भाजपा से निष्कासित कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने राजस्थान सामाजिक न्याय मंच की स्थापना की और वर्ष 2003 का विधानसभा चुनाव भाजपा के खिलाफ ताल ठोककर लड़ा। बीकानेर से देवी सिंह भाटी 67,197 मत पाकर शानदार तरीके से विजयी रहे, जबकि आधिकारिक भाजपा उम्मीदवार इस मुकाबले में तीसरे स्थान पर खिसक गया था।
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वर्ष 2008: किरोड़ी लाल मीणा का भाजपा से अलगाव और राष्ट्रीय पीपुल्स पार्टी का सफर वसुंधरा राजे के साथ वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों के चलते किरोड़ी लाल मीणा ने वर्ष 2008 में भाजपा से हमेशा के लिए नाते तोड़ लिए। उनकी पत्नी गोलमा देवी उस चुनाव में निर्दलीय विधायक के रूप में चुनी गईं और आगे चलकर गहलोत सरकार में मंत्री भी बनीं। वर्ष 2009 में किरोड़ी लाल मीणा ने दौसा लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत का लोहा मनवाया। इसके बाद वर्ष 2013 में वे पीए संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) में शामिल हो गए। उनकी इस पार्टी ने राज्य की करीब 150 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे और चार सीटों पर जीत दर्ज की, जिनमें से कई प्रत्याशी कांग्रेस और भाजपा के बागी नेता थे।
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वर्ष 2013: हनुमान बेनीवाल का भाजपा से मोहभंग और अपनी क्षेत्रीय पार्टी का उदय नागौर से भाजपा के तत्कालीन विधायक रहे हनुमान बेनीवाल ने वसुंधरा राजे और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ लगातार आक्रामक तेवर अपनाए रखे। अनुशासनहीनता के गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें पहले पार्टी से निलंबित किया गया और बाद में निष्कासित कर दिया गया। वर्ष 2013 के चुनाव में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में शानदार जीत हासिल की और बाद में अपनी एक अलग पार्टी 'राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी' (RLP) की नींव रखी। वर्ष 2018 में भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन और वर्ष 2019 में एनडीए (NDA) के घटक के रूप में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद, वर्ष 2020 में केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के विरोध में वे एनडीए गठबंधन से आधिकारिक रूप से अलग हो गए।
राजनीतिक विशेषज्ञों और वरिष्ठ पत्रकारों की राय
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम पर अपने विचार रखते हुए वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन का कहना है कि जब-जब किसी राजनीतिक दल का केंद्रीय हाईकमान कमजोर स्थिति में होता है या पार्टी सत्ता से बाहर होती है, तब-तब क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए सिर उठाते हैं और अपने व्यक्तिगत या राजनीतिक हित साधते हैं। उन्होंने कहा कि आज के समय में विश्वेंद्र सिंह से ज्यादा तीखे और धारदार तेवर वाले नेता भाजपा के भीतर भी मौजूद हैं, लेकिन चूंकि वर्तमान में भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व बेहद मजबूत और अनुशासित है, इसलिए वहाँ किसी की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह खुलकर बगावत कर सके।
कांग्रेस पार्टी की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस में छोटे कद के नेता भी अक्सर बड़े-बड़े और तीखे दावे करते नजर आते हैं, जो कि मूल रूप से हाईकमान के कमजोर होने का ही एक स्पष्ट लक्षण है। विश्वेंद्र सिंह के संदर्भ में यह चर्चा चल रही है कि पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देगी, लेकिन हकीकत यह है कि अभी कुछ ही दिन पहले जो लोग कांग्रेस पार्टी छोड़कर चले गए थे, पार्टी उन्हीं को वापस गले लगाकर खुशियां मना रही है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि पार्टी के पास कोई स्पष्ट और दूरदर्शी नीति नहीं है। चुनाव के समय नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया जाता है और चुनाव बीतने के बाद उन्हें वापस शामिल कर लिया जाता है। जब दोबारा चुनाव करीब आएंगे, तो इस अस्थिरता का खामियाजा दोनों ही दलों को भुगतना पड़ेगा। यही कमजोरियां अतीत में भाजपा के भीतर भी तब देखने को मिलती थीं जब उसका केंद्रीय नेतृत्व कमजोर हुआ करता था। उस दौर में घनश्याम तिवाड़ी, गुलाबचंद कटारिया, जसवंत सिंह और किरण माहेश्वरी समेत कई ऐसे बड़े नेता हुआ करते थे जो पार्टी लाइन से हटकर खुलकर बयानबाजी किया करते थे।
वरिष्ठ पत्रकार का यह भी मानना है कि जब सीपी जोशी ने अपनी नाराजगी जताई थी और खुद को एक 'कोलेबरेटर' बताया था, तब भी यूपीए केंद्र की सत्ता में काबिज थी, लेकिन उन्होंने कभी इस तरह की खुली और स्पष्ट बगावत नहीं की थी। मौजूदा समय में ऐसे दौर में विवाद छिड़ा है जब ठीक सामने स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव खड़े हैं। ऐसे संवेदनशील समय में इस तरह की अंदरूनी कलह से पार्टी को केवल नुकसान ही उठाना पड़ेगा।
दूसरी ओर, वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश भंडारी का यह विश्लेषण है कि राजनीति में लोग मूल रूप से अवसरवादी रुख अपनाते हैं। जब तक कांग्रेस पार्टी सत्ता में मजबूती से रहती है, तब तक कोई भी नेता कुछ नहीं बोलता, लेकिन जैसे ही पार्टी सत्ता से बाहर होती है, नेता अपने ही घर और परिवार तक के सदस्यों को सार्वजनिक रूप से निशाने पर लेने से नहीं चूकते। उन्होंने स्पष्ट किया कि भरतपुर क्षेत्र में अब विश्वेंद्र सिंह का वह पुराना राजनीतिक प्रभाव और जनाधार नहीं बचा है। विश्वेंद्र सिंह यहाँ पहले ही डॉ. दिगंबर सिंह और उनके सुपुत्र शैलेंद्र सिंह से भी चुनाव हार चुके हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए अब ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि वे लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी के साथ टिक पाएंगे, और कयास यही लगाए जा रहे हैं कि वे अब अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य की तैयारी में जुटे हुए हैं।

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