September 28, 2026

समुद्र में डूबी विश्व युद्ध की पनडुब्बी बनी खतरा, सामने आई बड़ी चिंता

बर्लिन। करीब 110 साल पहले समुद्र में डूबी एक जर्मन पनडुब्बी अब समुद्री पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा 'जहरीला टाइम बम' बनती जा रही है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान नॉर्थ सी (उत्तरी सागर) में समा चुकी इस पनडुब्बी के मलबे से टीएनटी (TNT) जैसे खतरनाक विस्फोटक पदार्थों के रिसाव का बड़ा खुलासा हुआ है। वैज्ञानिकों द्वारा पानी, समुद्री तल (सीबेड) और वहां रहने वाले जीवों के नमूनों की गई जांच में टीएनटी के अंश पाए गए हैं, जिससे पर्यावरणविदों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।

क्या है जर्मन पनडुब्बी UC-30 का इतिहास?

यह पूरा मामला जर्मनी की 'यूसी-30' (UC-30) पनडुब्बी से जुड़ा है। इतिहास के पन्नों के अनुसार, 19 अप्रैल 1917 को इंजन में तकनीकी खराबी आने के बाद जब यह पनडुब्बी वापस लौट रही थी, तब डेनमार्क के रोमो द्वीप के पास यह एक ब्रिटिश बारूदी सुरंग (Sea Mine) से टकराकर समुद्र में डूब गई थी। इस भीषण हादसे में पनडुब्बी पर सवार सभी 27 क्रू सदस्यों की मौत हो गई थी। करीब एक सदी तक यह मलबा समुद्र की गहराइयों में लापता रहा, जिसे आखिरकार वर्ष 2016 में खोजा गया था।

नमूनों की जांच और रिसाव का खतरा

'नॉर्थ सी रेक्स' परियोजना के तहत शोधकर्ताओं ने इस मलबे के आसपास से पानी, मिट्टी और समुद्री जीवों के नमूने एकत्र किए थे। आरहुस यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक कैटरीन जूल एंड्रेसन के अनुसार, विस्फोटक के ये अवशेष अब धीरे-धीरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में फैल रहे हैं। पानी में घुल रहे इन खतरनाक रसायनों के समुद्री जीवों तक पहुंचने से पर्यावरण पर लंबे समय तक घातक प्रभाव पड़ सकता है।

सबसे डराने वाली बात यह है कि इस डूबी हुई पनडुब्बी के भीतर छह टॉरपीडो और 18 माइंस (बारूदी सुरंगें) आज भी मौजूद होने की जानकारी है। समुद्री खारे पानी के लगातार संपर्क में रहने के कारण मलबे का धातु ढांचा धीरे-धीरे जंग खाकर कमजोर हो रहा है। समुद्री जीवों के ऊतकों (Tissues) में टीएनटी के अंश मिलना इस बात का प्रमाण है कि खतरा अब ज़मीनी हक़ीक़त बन चुका है।

हजारों डूबे जहाजों और विस्फोटकों का अंबार

विशेषज्ञों का कहना है कि यह गंभीर समस्या केवल एक अकेली पनडुब्बी तक सीमित नहीं है। अकेले डेनमार्क के समुद्री क्षेत्र में लगभग 10,127 डूबे हुए जहाजों के मलबे होने का अनुमान है, जिनमें से करीब 15 प्रतिशत मलबा प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौर का है। इन ऐतिहासिक मलबों के भीतर भारी मात्रा में बिना फटे हुए हथियार और विस्फोटक आज भी दबे हुए हैं।

इन पुराने मलबों को समुद्र से बाहर निकालना बेहद जोखिम भरा काम है, क्योंकि किसी भी पुराने हथियार या विस्फोटक को सीधे छूने या छेड़ने से बड़ा हादसा हो सकता है और जहरीले रसायन और अधिक तेजी से फैल सकते हैं। यही वजह है कि अब विशेषज्ञ रोबोटिक्स और दूर से संचालित होने वाली आधुनिक तकनीकों (ROVs) की मदद से इन खतरनाक विस्फोटकों को सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय करने या हटाने के नए विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।