नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव परिणामों में एक अनोखा एवं ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला है। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उपाध्यक्ष पद पर चुनाव लड़ने वाले दीपांशु शौकीन ने अपने विलक्षण एवं संकल्पबद्ध चुनाव प्रचार के बल पर शानदार विजय प्राप्त की है। संपूर्ण प्रचार अभियान के दौरान तथा मतगणना स्थल पर भी दीपांशु नंगे पैर ही पहुंचे।
सत्य निकेतन क्षेत्र में घटित पीजी हादसे के उपरांत विद्यार्थियों के अधिकारों एवं सुरक्षा की मांगों को लेकर उन्होंने संकल्प लिया था कि जब तक छात्र हित में ठोस निर्णय नहीं होते, वे जूते-चप्पल धारण नहीं करेंगे। चुनावी समर में भी उन्होंने अपने इस प्रण को पूर्ण निष्ठा से निभाया।
16 वर्षों के अंतराल के पश्चात निर्दलीय प्रत्याशी का ऐतिहासिक परचम
मूल रूप से पीरागढ़ी गांव निवासी दीपांशु शौकीन के पिता बस कंडक्टर एवं माता आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। पूर्व में नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) से जुड़े दीपांशु टिकट न मिलने पर संगठन से बगावत कर निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरे थे।
उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के प्रत्याशी ईशू मौर्या को 13,705 मतों के भारी अंतर से पराजित कर उपाध्यक्ष पद पर कब्जा किया। डूसू के इतिहास में लगभग 16 वर्षों के लंबे अंतराल के उपरांत किसी निर्दलीय प्रत्याशी ने इस शीर्ष पद पर विजय दर्ज की है। इससे पूर्व वर्ष 2009 में एबीवीपी समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी मनोज चौधरी ने अध्यक्ष पद जीता था।
डूसू चुनाव में एबीवीपी का दबदबा, तीन मुख्य पदों पर जीत
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी ने एक बार फिर अपना वर्चस्व सिद्ध करते हुए चार में से तीन मुख्य पदों पर कब्जा जमाया है।
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अध्यक्ष पद: एबीवीपी के यश डबास ने एनएसयूआई के विजय शंकर मीणा को 2,053 मतों के अंतर से पराजित किया। यश डबास को कुल 24,576 मत प्राप्त हुए।
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सचिव पद: एबीवीपी की रिया छाबड़ी ने एनएसयूआई की नम्रता चौधरी को 6,789 मतों से शिकस्त दी।
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संयुक्त सचिव पद: एबीवीपी के लक्ष्यराज सिंह ने समाजवादी पार्टी के छात्र संगठन के प्रत्याशी विशेष यादव को 827 मतों के सूक्ष्म अंतर से हराया।
जंतर-मंतर आंदोलन से लेकर डूसू तक युवा राजनीति का नया दिशा-निर्देश
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, हालिया महीनों में जंतर-मंतर पर शिक्षा, रोजगार एवं परीक्षा पारदर्शिता को लेकर उठी युवाओं की आवाज और तत्पश्चात डूसू चुनाव के परिणामों में गहरा संबंध देखने को मिला है।
विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर चंद्रचूड़ सिंह के अनुसार, भाजपा एवं एबीवीपी के शीर्ष नेतृत्व ने सड़क से उठी नई पीढ़ी की मांगों व असंतोष को भांपते हुए अपनी रणनीतियों में सामयिक बदलाव किया। सुदृढ़ सांगठनिक ढांचे, वैचारिक स्पष्टता एवं अनुशासित रणनीति के बल पर एबीवीपी ने युवाओं के बीच अपनी पैठ पुनः मजबूत की।
आंतरिक असंतोष के कारण एनएसयूआई का सूपड़ा साफ
कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को टिकट वितरण में उत्पन्न आंतरिक असंतोष का भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। संगठन के तीन बागी प्रत्याशी चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे थे, जिसके परिणामस्वरूप मतों का भारी बिखराव हुआ। स्थिति यह रही कि एनएसयूआई का खाता भी नहीं खुल सका। उपाध्यक्ष पद पर पार्टी प्रत्याशी को मात्र 4,313 वोट मिले, जो नोटा (NOTA) को मिले मतों से भी कम थे।
नोटा को मिले आइसा और एसएफआई के कुल योग से अधिक मत
इस डूसू चुनाव में नोटा का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से देखने को मिला। विभिन्न पदों पर नोटा को कुल 23,942 मत प्राप्त हुए। यह संख्या वामपंथी छात्र संगठनों आइसा (AISA) एवं एसएफआई (SFI) के सभी चार प्रत्याशियों को मिले कुल 22,331 मतों के योग से भी अधिक रही। कुल 20 चरणों की मतगणना के उपरांत शनिवार सायंकाल चुनाव परिणामों की आधिकारिक घोषणा की गई।

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