वाशिंगटन। अमेरिका के प्रख्यात अर्थशास्त्री और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेफ्री सैक्स ने भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार और वैश्विक प्रभाव को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण दावा किया है। उनके अनुसार, आने वाले दशकों में भारत और चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में उभर सकते हैं, जिससे वैश्विक आर्थिक शक्ति का केंद्र एक बार फिर से एशिया की ओर लौट सकता है।
भारत और चीन बन सकते हैं दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाएं
एक साक्षात्कार के दौरान जेफ्री सैक्स ने कहा कि भारत और चीन के बीच बेहतर आपसी सहयोग दुनिया को एक ऐसी व्यवस्था की ओर ले जा सकता है, जहां किसी एक महाशक्ति का एकाधिकार या दबदबा नहीं रहेगा। उनके आकलन के मुताबिक, अगले 25 साल से भी कम समय में भारत और चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की सूची में शीर्ष पर पहुंच सकते हैं, जिसके चलते अमेरिका आर्थिक ताकत के मामले में तीसरे स्थान पर खिसक सकता है।
भारत की क्षमता और जनसांख्यिकीय लाभ
सैक्स ने भारत की आर्थिक ताकत की सराहना करते हुए कहा कि इस सदी के किसी भी चरण में भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की पूरी क्षमता मौजूद है। उन्होंने इसके पीछे भारत की बढ़ती युवा आबादी और इसके विपरीत चीन में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी होने को एक मुख्य वजह बताया है। उनका मानना है कि यह मजबूत विकास क्रम अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति को और अधिक प्रभावी बनाएगा।
भारत-चीन सहयोग और बहुध्रुवीय दुनिया
अर्थशास्त्री ने दोनों एशियाई दिग्गजों के संबंधों पर जोर देते हुए कहा कि यदि नई दिल्ली और बीजिंग आर्थिक स्तर पर मिलकर काम करते हैं, तो इसका व्यापक लाभ पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को मिलेगा। व्यापार में बढ़ोतरी, विदेशी निवेश, तकनीकी साझेदारियों और ग्लोबल सप्लाई चेन में सहयोग से दोनों देशों को फायदा होगा। इससे दुनिया एक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ेगी, जहां सत्ता किसी एक देश के हाथ में केंद्रित न होकर कई केंद्रों में विभाजित होगी।
वैश्विक शक्ति का केंद्र एशिया की ओर
जेफ्री सैक्स ने रेखांकित किया कि 'ब्रिक्स' जैसे संगठन वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी बड़ी हिस्सेदारी के साथ दुनिया में शक्ति संतुलन को आकार देने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। आज अमेरिका के साथ-साथ चीन, भारत और रूस जैसे देश अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक आर्थिक गतिविधियों का केंद्र एक बार फिर इतिहास की तरह एशिया की तरफ लौट रहा है।

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