बीजिंग। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद भारत से रवाना होते ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिका के सामने ताइवान के मुद्दे पर एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। सामने आई जानकारी के अनुसार, चीन ने अमेरिका के ट्रंप प्रशासन को स्पष्ट संकेत दिया है कि ताइवान उसके लिए 'रेड लाइन' है और यदि अमेरिका ताइवान को हथियारों की कोई नई खेप देने की मंजूरी देता है, तो आगामी 24 सितंबर को व्हाइट हाउस में प्रस्तावित ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात को रद्द किया जा सकता है।
भारत दौरे के तुरंत बाद कड़ा रुख
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हाल ही में संपन्न 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक की, जो उनके सात साल बाद भारत का पहला दौरा था। हालांकि, भारत से विदा होते ही बीजिंग की ओर से वॉशिंगटन पर दबाव बनाने वाला यह नया दांव सामने आया है, जिसने अमेरिका के सामने एक गंभीर असमंजस पैदा कर दिया है कि वह ताइवान को हथियार आपूर्ति जारी रखे या जिनपिंग के साथ होने वाली इस उच्च-स्तरीय बैठक को बचाए। हालांकि, दोनों देशों की सरकारों की तरफ से इस कथित धमकी और हथियार सौदे को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया गया है।
डोनाल्ड ट्रंप के सामने दोहरी चुनौती
नियोजित कार्यक्रम के अनुसार, 24 सितंबर को व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक प्रस्तावित है, जो पिछले एक साल के भीतर दोनों नेताओं की तीसरी मुलाकात होगी। लेकिन ताइवान को लेकर उपजा यह विवाद इस बैठक के रास्ते में एक बड़ा रोड़ा बनता दिख रहा है।
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चीन ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है और आवश्यकता पड़ने पर बल प्रयोग की संभावना से भी पीछे नहीं हटता।
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दूसरी ओर, अमेरिका ताइवान का प्रमुख राजनीतिक और सैन्य साझेदार है, जो लगातार उसे हथियार मुहैया कराता रहा है।
चीन इन सैन्य समझौतों को सीधे तौर पर अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर हमला मानता है।
ताइवान पर चीन की पुरानी और सख्त नीति
विशेषज्ञों का मानना है कि ताइवान को लेकर जिनपिंग का यह रुख पूरी तरह से उनके पुराने और कड़े रुख के अनुरूप है। इससे पहले मई में बीजिंग में हुई बैठक के दौरान भी जिनपिंग ने अमेरिका को चेतावनी दी थी कि ताइवान दोनों देशों के संबंधों का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा है। यदि इसे संभलकर नहीं हैंडल किया गया, तो दोनों महाशक्तियों के बीच सीधा टकराव हो सकता है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ट्रंप प्रशासन इस रणनीतिक चुनौती से कैसे निपटता है और क्या 24 सितंबर को यह बहुप्रतीक्षित शिखर बैठक तय समय पर हो पाती है या नहीं।

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