September 1, 2026

अपनों ने छोड़ा तो आश्रम बना सहारा, 125 महिलाओं की बायोमेट्रिक से हुई पहचान

वाराणसी | उत्तर प्रदेश के वाराणसी और इसके आसपास के इलाकों से एक बेहद दर्दनाक और मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। यहाँ 'अपना घर आश्रम' में रह रही 130 लावारिस और बेसहारा महिलाओं की पहचान फिंगरप्रिंट और आइरिस (आंखों की पुतली) स्कैन के माध्यम से कर ली गई है, लेकिन इसके बावजूद उनके स्वजनों ने उन्हें अपने घर वापस ले जाने से पूरी तरह इंकार कर दिया है। स्थिति यह है कि इनमें से कई महिलाओं के पिता जमींदार या पति सरकारी पदों पर कार्यरत रहे हैं, फिर भी वे अपनों के दुत्कारे जाने का दर्द झेल रही हैं। गंभीर बीमारियों के चलते पिछले छह महीनों के दौरान इनमें से पांच महिलाओं की मृत्यु भी हो चुकी है, जबकि शेष 125 महिलाएं वर्तमान में वाराणसी के सामने घाट स्थित अपना घर आश्रम में आश्रय प्राप्त कर रही हैं।

बायोमेट्रिक से मिली पहचान, पर अपनों ने फेरा मुंह

जिला प्रोबेशन विभाग के सहयोग से गंगा घाटों, बाजारों और चौराहों पर लावारिस हालत में मिलने वाली इन महिलाओं को आश्रम पहुंचाया गया था। यहां विशेष प्रयासों के तहत आइरिस और फिंगरप्रिंट स्कैन के जरिए इन सभी महिलाओं के बायोमेट्रिक पहचान पत्र (डेटा) निकाले गए, जिसके आधार पर उनके पते और परिजनों की जानकारी जुटाई गई।

जब आश्रम प्रशासन और प्रोबेशन विभाग के अधिकारियों ने उनके परिवारों से संपर्क साधा, तो परिजनों ने इन महिलाओं को अपने साथ रखने से दो टूक मना कर दिया। शुरुआती जाँच में यह बात सामने आई है कि किसी महिला को पारिवारिक संपत्ति के लालच में घर से बाहर निकाल दिया गया था, तो किसी की मानसिक स्थिति बिगड़ने या गंभीर रूप से बीमार होने पर उसे सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया गया।

सामने आए कुछ प्रमुख और झकझोर देने वाले मामले

  • केस 1: चंदौली जिले की रहने वाली 45 वर्षीय एक महिला छह महीने पहले कबीरचौरा स्थित मंडलीय अस्पताल में लावारिस हालत में मिली थी। चार महीने के इलाज के बाद बायोमेट्रिक से उसकी पहचान हुई। पता चला कि उसके पिता चंदौली में जमींदार थे और पति वाराणसी के अर्दली बाजार में जल निगम में कर्मचारी है। पिता के निधन के बाद पति से विवाद होने पर उसने तलाक ले लिया था और मानसिक स्थिति बिगड़ने पर चचेरे भाई ने उसकी जमीन हड़प ली। अब उसका भाई भी उसे साथ रखने को तैयार नहीं है।

  • केस 2: रोहनिया क्षेत्र में चार महीने पहले एक 75 वर्षीय बुजुर्ग महिला सड़क के किनारे नाले के पास बेहद अस्वस्थ अवस्था में मिली थी। परिजनों ने बीमारी के चलते उसका इलाज कराने के बजाय उसे बेसहारा छोड़ दिया। आश्रम में दो महीने तक चले इलाज के बाद भी महिला की मौत हो गई, लेकिन अमानवीयता की इंतहा देखिए कि परिजन उनका अंतिम संस्कार करने के लिए शव तक लेने नहीं आए।

  • केस 3: जौनपुर की रहने वाली 45 वर्षीय महिला चोलापुर क्षेत्र में सड़क पर अचेत पड़ी मिली थी। उसके सिर में गंभीर चोट थी और उचित देखभाल न मिलने के कारण घाव में कीड़े तक पड़ चुके थे। मानसिक रूप से अस्वस्थ इस महिला की पहचान होने पर जब जौनपुर में उसके सास-ससुर से संपर्क किया गया, तो उन्होंने भी उसे अपनाने से साफ मना कर दिया।

  • केस 4: प्रयागराज की एक 75 वर्षीय बुजुर्ग महिला को उसका ही पोता काशी घुमाने के बहाने बहला-फुसलाकर ले आया था और रोडवेज बस स्टैंड के बाहर थोड़ी देर में लौटने की बात कहकर फरार हो गया। बाद में रोडवेज अधिकारियों और पुलिस की मदद से उसे आश्रम पहुँचाया गया, लेकिन परिजनों ने उसे वापस ले जाने से इंकार कर दिया।

महिला आयोग की सख्त प्रतिक्रिया

इस अमानवीय और गंभीर स्थिति पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष चारू चौधरी ने कहा है कि मानसिक रूप से अस्वस्थ और बुजुर्ग महिलाओं को इस तरह घर से बेदखल करना बेहद गंभीर अपराध और अमानवीय कृत्य है। उन्होंने चेतावनी दी है कि महिला आयोग इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाएगा। जिला प्रशासन और पुलिस विभाग के साथ मिलकर इन सभी मामलों की गहन जाँच कराई जाएगी और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। साथ ही, इन पीड़ित महिलाओं के अधिकारों, समुचित भरण-पोषण और उनकी काउंसलिंग की व्यवस्था भी प्राथमिकता से कराई जाएगी।

आश्रम प्रशासन के प्रयास और वर्तमान स्थिति

अपना घर आश्रम के प्रबंधकों का कहना है कि संस्था में इन बेसहारा महिलाओं के खान-पान, रहने और स्वास्थ्य की उचित व्यवस्था की जा रही है। उनकी पहचान सुनिश्चित करने के लिए नियमित रूप से विशेष आधार शिविर (कैंप) आयोजित किए जाते हैं। फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैन की मदद से अब तक 130 महिलाओं के दस्तावेज तैयार किए जा चुके हैं और उनके पतों का पता लगाकर परिजनों से संवाद स्थापित किया गया, परंतु अधिकांश स्थानों से सकारात्मक सहयोग नहीं मिल पाया है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान प्रशासनिक प्रयासों के बावजूद पांच महिलाओं की इलाज के दौरान मौत हो गई, जो समाज और परिवार की संवेदनाओं पर एक बड़ा सवालिया निशान है।