उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल इन दिनों मां नंदा देवी महोत्सव की तैयारियों से गुलजार है. 15 सितंबर से शहर में मां नंदा-सुनंदा की भव्य पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन शुरू होंगे. महोत्सव के दौरान हजारों श्रद्धालु मां नंदा और सुनंदा के दर्शन के लिए नैनीताल पहुंचते है. इस बीच एक सवाल अक्सर उठता रहा है कि क्या नैनीताल की आराध्य मां नयना देवी और नंदा-सुनंदा एक ही देवी हैं. लोक मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं के अनुसार दोनों की कथा, स्वरूप और पूजा की परंपरा अलग-अलग है. नैनीताल की मां नयना देवी मंदिर की मान्यता माता सती से जुड़ी हुई है. पौराणिक कथा के अनुसार, माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर विचरण कर रहे थे. तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया. मान्यता है कि माता सती का बायां नेत्र नैनीताल में गिरा था. इसी वजह से यहां मां नयना देवी को शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है.
कहां गिरा दूसरा नेत्र
मंदिर के पुजारी बसंत बल्लभ पांडे बताते हैं कि नयना देवी और नंदा देवी अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हैं. उनके अनुसार, नैनीताल में माता सती का बायां नेत्र गिरने की मान्यता है, जबकि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में उनका दायां नेत्र गिरा माना जाता है. दोनों स्थानों पर शक्तिपीठ की परंपरा विकसित हुई. मां नयना देवी के नाम से ही नैनीताल के नाम को भी जोड़ा जाता है. मंदिर के गर्भगृह में मां नयना के नेत्र स्वरूप की पूजा होती है. यहां मां काली और भगवान गणेश की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं.
कौन हैं मां नंदा-सुनंदा
मां नंदा-सुनंदा की मान्यता उत्तराखंड की लोक आस्था और संस्कृति से गहराई से जुड़ी है. कुमाऊं और गढ़वाल के कई क्षेत्रों में मां नंदा को हिमालय की पुत्री, आराध्य और इष्ट देवी के रूप में पूजा जाता है. धार्मिक परंपरा में उन्हें माता पार्वती का स्वरूप भी माना जाता है. मां नंदा के साथ सुनंदा की पूजा की परंपरा भी विशेष है. लोक मान्यता में दोनों को बहनों के रूप में देखा जाता है. भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के अवसर पर कुमाऊं में मां नंदा-सुनंदा की विशेष पूजा की जाती है. मां नंदा को राजराजेश्वरी और नंदनी जैसे स्वरूपों में भी पूजा जाता है. श्री राम सेवक सभा के पदाधिकारी डॉ. ललित तिवारी बताते हैं कि मां नयना देवी नैनीताल की प्रसिद्ध शक्ति हैं, जबकि मां नंदा को उत्तराखंड की आराध्य और राजराजेश्वरी देवी के रूप में पूजा जाता है. नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव इसी लोक आस्था, संस्कृति और सदियों पुरानी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
चंद वंश से क्या कनेक्शन
मां नंदा की आराधना का इतिहास कुमाऊं के चंद राजवंश से भी जुड़ा बताया जाता है. मान्यता के अनुसार, 1617 ई. में राजा बाजबहादुर चंद द्वारा अल्मोड़ा में नंदा देवी की स्थापना की गई थी. मां नंदा को चंद वंश की कुलदेवी के रूप में भी पूजा जाता रहा है. नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव की शुरुआत वर्ष 1902 में मोतीराम साह के प्रयासों से हुई बताई जाती है. सौ वर्ष से अधिक समय से यह आयोजन नैनीताल की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना हुआ है.
अश्रुधारा से बनी नैनीझील
मां नयना देवी से जुड़ी लोक मान्यता में नैनीताल की नैनीझील का संबंध भी माता सती से जोड़ा जाता है. कहा जाता है कि माता सती के नेत्र और उनसे निकली अश्रुधारा से इस क्षेत्र में झील का निर्माण हुआ. इसी वजह से नैनीताल को धार्मिक आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा संगम माना जाता है. इस तरह मां नयना देवी और मां नंदा-सुनंदा की आस्था अलग-अलग परंपराओं से जुड़ी होने के बावजूद दोनों ही उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा हैं. एक ओर नयना देवी की मान्यता शक्तिपीठ और माता सती के नेत्रों से जुड़ी है, तो दूसरी ओर नंदा-सुनंदा हिमालय, लोक आस्था और उत्तराखंड की आराध्य देवी के रूप में पूजी जाती हैं. यही विविधता नैनीताल और पूरे कुमाऊं की संस्कृति को और खास बनाती है.

More Stories
दुनिया बसाने के बाद भी नहीं क्यों नहीं होती ब्रह्मा जी की पूजा? ले डूबा पत्नी से खटपट
मथुरा-वृंदावन में 4 सितंबर को कृष्ण जन्मोत्सव, 15 साल बाद बन रहा दुर्लभ संयोग, जानें कब है नंदोत्सव?
प्रयागराज में बड़े हनुमान मंदिर के गर्भगृह में पहुंचा गंगा का पानी, मां गंगा ने किया लेटे हुए हनुमानजी का जलाभिषेक