August 21, 2026

पूर्व भारतीय बल्लेबाज जैकब मार्टिन को अदालत ने किया बरी, लंबे इंतजार के बाद मिली राहत

नई दिल्ली: पूर्व भारतीय क्रिकेटर जैकब मार्टिन (Jacob Martin) को पटियाला हाउस कोर्ट ने 22 साल पुराने एक आपराधिक मामले में सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया है। यह पूरा मामला साल 2004 में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से जुड़ा हुआ था, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420, 468, 471 और 120बी के साथ-साथ पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 के तहत आरोप तय किए गए थे। उल्लेखनीय है कि दाएं हाथ के बल्लेबाज जैकब मार्टिन ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में भारत के लिए 10 एकदिवसीय (ODI) मैच खेले हैं, जिसमें उन्होंने 22.57 की औसत से कुल 158 रन बनाए थे।

क्या था 22 साल पुराना पूरा मामला?

जैकब मार्टिन पर जाली यूके इमिग्रेशन (UK Immigration) स्टाम्प के इस्तेमाल, यात्रा व्यवस्था और संदिग्ध वित्तीय लेनदेन से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिन्हें अभियोजन पक्ष अदालत में साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने अपनी सुनवाई के दौरान पाया कि वित्तीय लेनदेन या संबंधित 'अजवा स्पोर्ट्स क्लब' पर उनके स्वामित्व अथवा नियंत्रण को लेकर कोई भी ठोस और विश्वसनीय सबूत रिकॉर्ड पर नहीं आया है। इसके अलावा, मामले के कई गवाह भी इन आरोपों की पुष्टि करने में नाकाम रहे।

मीडिया से बातचीत करते हुए जैकब मार्टिन ने साझा किया कि यह पूरा घटनाक्रम वर्ष 2004 में शुरू हुआ था, जब भारतीय टीम इंग्लैंड दौरे पर गई थी। टूर समाप्त होने के बाद टीम के अधिकांश खिलाड़ी वापस लौट आए, लेकिन एक खिलाड़ी वीजा की अवधि समाप्त होने के बावजूद ब्रिटेन में ही रुक गया था। बाद में उसने कथित तौर पर फर्जी आव्रजन स्टाम्प लगवाकर भारत लौटने का प्रयास किया। जब वह वापस लौटा, तो उसे नई दिल्ली हवाई अड्डे पर अधिकारियों द्वारा पकड़ लिया गया और पूछताछ शुरू हुई।

आरोपों के कारण गंवानी पड़ी थी रेलवे की नौकरी

जैकब मार्टिन ने दर्द साझा करते हुए बताया कि इस दो दशक पुराने कानूनी मुकदमे के कारण उन्हें भारी मानसिक प्रताड़ना और तनाव का सामना करना पड़ा। इस झूठे आरोप की वजह से उन्हें अपनी रेलवे की नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा था। उन्होंने कहा कि अदालत का यह फैसला उनके जीवन का एक बहुत बड़ा मोड़ और बड़ी राहत लेकर आया है।

उन्होंने आगे बताया, "मूल एफआईआर में मेरा नाम दूर-दूर तक शामिल नहीं था, लेकिन बाद में जांच के दौरान चूंकि मैं एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर था और मेरा नाम उस समय काफी चर्चा में था, इसलिए मुझे इस मामले में जबरन घसीट लिया गया। इन 22 वर्षों के लंबे अंतराल के दौरान मुझे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) से भी किसी प्रकार की स्पष्ट प्रतिक्रिया या मदद नहीं मिल पाई। इस पूरी प्रक्रिया ने मुझे बहुत गहरा मानसिक तनाव दिया, लेकिन अब अदालत से क्लीन चिट मिलने के बाद मेरे जीवन में एक सुखद और सकारात्मक बदलाव आया है।"