August 11, 2026

पति की मौत के बाद आर्थिक मदद की आस, संबल राशि के लिए महीनों से दफ्तरों के चक्कर लगा रही महिला

नीमच: मध्य प्रदेश के नीमच जिले के भोलियावास गांव से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों और उनकी जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। सरकार ने जिन गरीब और श्रमिक परिवारों की सामाजिक सुरक्षा के लिए 'संबल योजना' बनाई थी, उसी योजना का हक पाने के लिए एक बेसहारा विधवा महिला को अपने दो नाबालिग बच्चों के साथ दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। सरकारी कार्यालयों में जिम्मेदार कर्मचारियों द्वारा एक से दूसरे ऑफिस भटकाए जाने से तंग आकर आखिरकार चार महीने से परेशान इस महिला ने जनसुनवाई में पहुंचकर जिला कलेक्टर से न्याय की गुहार लगाई है।

काम के दौरान करंट लगने से गई थी पति की जान

प्राप्त जानकारी के अनुसार, भोलियावास निवासी नरेंद्र कुमार माली पेशे से एक साधारण मजदूर थे और मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। बीते 8 अप्रैल 2026 को कार्य के दौरान करंट लगने से एक दर्दनाक हादसे में उनकी असमय मौत हो गई थी। नरेंद्र कुमार मध्य प्रदेश सरकार की 'मुख्यमंत्री जनकल्याण (संबल) योजना 2018' के तहत पंजीकृत एक नियमित श्रमिक थे। घर के एकमात्र कमाने वाले मुखिया की अचानक हुई इस मौत के बाद उनकी पत्नी सपना माली और दो छोटे बच्चों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

ग्राम पंचायत की बेरुखी, आवेदन तक नहीं किया स्वीकार

पीड़ित पत्नी सपना माली का आरोप है कि पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद जब वह संबल योजना के तहत मिलने वाली अनुग्रह सहायता राशि और अंत्येष्टि सहायता के लिए अपनी ग्राम पंचायत पहुंचीं, तो वहां के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने न केवल उनकी बात अनसुनी कर दी, बल्कि उनका आवेदन तक स्वीकार करने से इंकार कर दिया। पिछले चार महीनों से प्रशासनिक उदासीनता और भीषण आर्थिक तंगी का सामना करने के बाद, आखिरकार मजबूर होकर सपना माली ने अपने नाबालिग बच्चों के साथ नीमच कलेक्ट्रेट पहुंचकर कलेक्टर के समक्ष अपनी पीड़ा रखी है।

सहायता राशि के लिए प्रशासनिक गुहार

कलेक्टर को सौंपे गए अपने आवेदन में सपना माली ने बताया कि उनके दिवंगत पति का संबल योजना के तहत पंजीयन संख्या मौजूद है। उन्होंने प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि नियमों के दायरे में रहते हुए उन्हें जल्द से जल्द योजना की निर्धारित सहायता राशि और अंत्येष्टि मदद दिलाई जाए, ताकि वे किसी तरह अपने अनाथ बच्चों का पालन-पोषण कर सकें।

यह पूरा मामला प्रशासनिक व्यवस्था की सुस्ती और जमीनी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। अब यह देखना होगा कि जिला कलेक्टर के संज्ञान में यह मामला आने के बाद सपना माली और उनके बच्चों को कब तक 'संबल' मिल पाता है।