नई दिल्ली| देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक फेसबुक वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बहुचर्चित मामले में अब केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए मेटा (Meta) के शीर्ष अधिकारियों को तलब किया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने मंगलवार को मीडिया को जानकारी दी कि सरकार ने मेटा की ग्लोबल टीम को आगामी 5-6 अगस्त को विशेष रूप से भारत बुलाया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि मेटा जैसी दिग्गज टेक कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके एल्गोरिदम और सिस्टम पूरी जिम्मेदारी के साथ उम्मीद के मुताबिक काम करें।
इससे पहले सोमवार को संसद की 'सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति' की एक उच्चस्तरीय बैठक में भी यह मामला जोर-शोर से उठाया गया था। समिति ने मेटा के नुमाइंदों से इस गंभीर लापरवाही पर कड़े सवाल किए और वीडियो को अचानक हटाए जाने के पीछे की वजहों का स्पष्टीकरण मांगा। हालांकि, मेटा ने बैठक के दौरान यह स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री का वह वीडियो 'तकनीकी त्रुटि' (technical glitch) के कारण गलती से डिलीट हो गया था और इसके लिए कंपनी ने माफी भी मांगी। लेकिन, समिति के कई सदस्यों ने कड़ा ऐतराज जताते हुए स्पष्ट किया कि केवल औपचारिक माफी मांग लेने से बात खत्म नहीं होगी, बल्कि इस मामले में सख्त जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
संसदीय समिति के सामने मेटा ने क्या सफाई दी?
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता में आयोजित इस महत्वपूर्ण संसदीय स्थायी समिति की बैठक का मुख्य एजेंडा सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के नियमन (regulation) पर विचार-विमर्श करना था। इस बैठक में गूगल, मेटा, यूट्यूब, एक्स (ट्विटर), स्नैपचैट के साथ-साथ गृह मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के वरिष्ठ प्रतिनिधि भी शामिल हुए।
बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक वीडियो हटाए जाने का मुद्दा सबसे प्रमुख रहा। इस पर मेटा के अधिकारियों ने सफाई देते हुए कहा कि यह घटना किसी दुर्भावना के तहत नहीं, बल्कि एक तकनीकी खामी की वजह से हुई थी और बाद में वीडियो को तुरंत बहाल (restore) भी कर दिया गया था।
सांसद निशिकांत दुबे ने क्या कड़ी मांग रखी?
सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष और सांसद निशिकांत दुबे ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यदि देश के प्रधानमंत्री का वीडियो हटाने जैसी गंभीर घटना होती है, तो इसके लिए कंपनी को स्पष्ट जिम्मेदारी तय करनी होगी। उन्होंने यहाँ तक मांग की कि मेटा के वैश्विक प्रमुख मार्क जुकरबर्ग को स्वयं आगे आकर इस मामले में माफी मांगनी चाहिए।
उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में यह भी कहा कि यदि टेक कंपनियां अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं करती हैं, तो भारत में उन्हें मिलने वाली 'सेफ हार्बर' (Safe Harbor) सुरक्षा पर गंभीर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। उनका स्पष्ट मानना था कि किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म को भारत में कारोबार करने के लिए यहाँ के कानूनों और पूर्ण जवाबदेही के दायरे में रहकर ही काम करना होगा।
'सेफ हार्बर' सुरक्षा को लेकर क्यों उठ रहे हैं बड़े सवाल?
आपको बता दें कि 'सेफ हार्बर' एक ऐसी कानूनी सुरक्षा व्यवस्था है, जिसके तहत सोशल मीडिया कंपनियों को उनके प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं द्वारा अपलोड की जाने वाली सामग्री के लिए कुछ निश्चित शर्तों के साथ कानूनी संरक्षण (immunity) मिलता है।
निशिकांत दुबे का कहना है कि यदि कोई डिजिटल मंच अपनी प्राथमिक जिम्मेदारियों का सही ढंग से पालन नहीं करता या इस तरह के बेहद संवेदनशील मामलों में लापरवाही बरतता है, तो इस कानूनी सुरक्षा की समीक्षा की जानी चाहिए। उनके इस तीखे बयान के बाद देश में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही और उनके नियंत्रण को लेकर चल रही बहस और अधिक तेज हो गई है।
समिति के सदस्यों ने मेटा से पूछे तीखे सवाल
संसदीय समिति की बैठक के दौरान विभिन्न दलों के सदस्यों ने मेटा के अधिकारियों पर सवालों की बौछार कर दी। सदस्यों का कहना था कि यह मामला सिर्फ माफी मांगकर रफा-दफा नहीं किया जा सकता। उन्होंने पूछा कि आखिर प्रधानमंत्री का वीडियो हटाने के लिए जिम्मेदार संबंधित अधिकारी या एल्गोरिदम यूनिट के खिलाफ कंपनी ने क्या आंतरिक कार्रवाई की है? कुछ सदस्यों ने दोषी लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग भी उठाई। इसके अलावा, मेटा से यह भी कड़ा सवाल किया गया कि उसके प्लेटफॉर्म पर समय-समय पर आने वाली विवादित और आपत्तिजनक सामग्री को रोकने के लिए कंपनी ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं और ऐसे मामलों में उसकी वास्तविक जवाबदेही क्या है।

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