दतिया उपचुनाव में बीजेपी क्यों हारी? नरोत्तम मिश्रा की नाराजगी या आशुतोष की रणनीति

दतिया| मध्य प्रदेश की हाई-प्रोफाइल दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजे सामने आ चुके हैं, जिसमें कांग्रेस पार्टी ने शानदार जीत दर्ज की है। इस सीट पर कांग्रेस की यह लगातार दूसरी बड़ी जीत है। इस राजनीतिक उलटफेर के बाद राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि भाजपा के दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा के टिकट कटने और उसके बाद उपजे हालात के बीच कांग्रेस ने अपनी रणनीति मजबूत कर इस सीट पर कब्जा जमाया है। इस चुनाव में कांग्रेस ने 6 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की है, जिसके पीछे कई सियासी समीकरण और अंदरूनी कारण बताए जा रहे हैं।

क्या नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटना बना हार की बड़ी वजह?

प्रदेश के तमाम राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दतिया में भाजपा की हार की पटकथा उसी दिन लिख जानी शुरू हो गई थी जब स्थानीय स्तर पर बड़े बदलाव किए गए। इसके अलावा, इस बार कांग्रेस पार्टी की एकजुटता के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी के भीतर चल रही अंतर्कलह खुलकर सामने आ गई, जिसका सीधा फायदा कांग्रेस उम्मीदवार को मिला।

दतिया में भाजपा की हार के प्रमुख कारण:

  • बाहरी प्रत्याशी का मुद्दा: राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा द्वारा दतिया से बाहर के उम्मीदवार को मैदान में उतारे जाने के कारण जनता के साथ उनका सीधा और जमीनी जुड़ाव नहीं बन पाया।

  • संगठन से पहचान का अभाव: भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी की पहचान मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पृष्ठभूमि से जुड़ी रही है, लेकिन आम जनता के बीच उनकी सक्रियता और जन-पहचान नरोत्तम मिश्रा के मुकाबले काफी कम थी, जो हार का एक बड़ा कारण बनी।

  • टिकट वितरण के बाद अंतर्कलह: दतिया में नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटे जाने के बाद से ही पार्टी के भीतर और आसपास के क्षेत्रों में भारी असंतोष व अंतर्कलह देखने को मिली। स्थिति यह हो गई कि हर छोटी-बड़ी चुनावी जिम्मेदारी सीधे मंत्रियों के कंधों पर डालनी पड़ी।

  • ब्राह्मण मतों का छिटकना: टिकट कटने से कार्यकर्ताओं और समर्थकों में यह संदेश गया कि पार्टी अपने पुराने और कद्दावर नेताओं को साइडलाइन कर रही है, जिसके चलते एक बड़ा वर्ग नाराज हो गया और ब्राह्मण मतदाताओं का झुकाव भाजपा से दूर हो गया। इसका नतीजा यह रहा कि भाजपा उम्मीदवार पूर्व मंत्री के अपने ही बूथ पर भी चुनाव हार गए।

  • अन्य अंदरूनी कारण: इसके अलावा वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी और जमीनी स्तर पर अपेक्षित सहयोग न मिलना भी भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हुआ।

कांग्रेस की जीत और उसकी रणनीति के मुख्य बिंदु:

  • रणनीतिक और स्थानीय चयन: कांग्रेस ने भाजपा की हर गतिविधि पर नजर रखते हुए बेहद सोच-समझकर स्थानीय नेता को मैदान में उतारा, जिससे जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित करने में आसानी हुई।

  • बूथ स्तर पर मजबूती: कांग्रेस पार्टी ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। पार्टी के बड़े और वरिष्ठ नेताओं ने व्यक्तिगत रूप से गांव-गांव जाकर छोटी-छोटी बैठकें और सभाएं कीं तथा कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह के पक्ष में मजबूत माहौल तैयार किया।

  • पार्टी की एकजुटता और सक्रियता: चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस पूरी तरह एकजुट नजर आई। मतदान से ठीक पहले अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया गया, जिससे पार्टी का कड़ा संदेश जनता तक गया। स्वयं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सक्रिय रूप से मोर्चा संभालते हुए अधिकांश बूथों का दौरा किया और मतदाताओं से सीधा संपर्क साधा।

कुल मिलाकर, विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा आलाकमान द्वारा लिए गए कुछ स्थानीय फैसले और सांगठनिक स्तर पर उपजा असंतोष पार्टी को भारी पड़ गया, जिसका पूरा लाभ उठाते हुए कांग्रेस ने दतिया की इस सीट पर एक बार फिर अपना परचम लहरा दिया है।