उपेंद्र कुशवाहा के आगे झुकी BJP? MLC के इस्तीफे से बदले सियासी समीकरण

पटना। बिहार की राजनीति में शुक्रवार को एक बड़ा सियासी घटनाक्रम देखने को मिला है, जहां राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का मंत्री पद सुरक्षित रखने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने एक बड़ा राजनीतिक त्याग किया है। नियमों के तहत बिना किसी सदन की सदस्यता के मंत्री पद पर बने रहने की तय समयसीमा पूरी होने के करीब होने के कारण उनकी कुर्सी पर संकट मंडरा रहा था, जिसे बचाने के लिए बीजेपी एमएलसी देवेश कुमार ने अपनी विधान परिषद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।

राज्यपाल कोटे से विधान परिषद सदस्य थे देवेश कुमार, कार्यकाल के आठ महीने शेष रहते छोड़ी सीट

अपना इस्तीफा देने वाले देवेश कुमार राज्यपाल कोटे से विधान परिषद के सदस्य (MLC) थे और उनके कार्यकाल के अभी लगभग आठ महीने का समय शेष बचा हुआ था। अब देवेश कुमार द्वारा छोड़ी गई इसी रिक्त सीट पर उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने की तैयारी पूरी कर ली गई है, जिससे उनका मंत्री पद संवैधानिक रूप से सुरक्षित बना रहेगा। पिछले कुछ समय से लगातार विपक्ष और राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर कयास लगाए जा रहे थे कि बिना सदन के सदस्य रहे मंत्री पद पर कब तक यह व्यवस्था चलेगी, ऐसे में यह निर्णय उपेंद्र कुशवाहा खेमे के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है।

प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने विधान परिषद सभापति को सौंपा इस्तीफा पत्र, जल्द जारी होगी अधिसूचना

शुक्रवार को हुए इस घटनाक्रम के तहत बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी स्वयं विधान परिषद पहुंचे और देवेश कुमार का इस्तीफा विधिवत रूप से विधान परिषद के सभापति को सौंपा, इस दौरान देवेश कुमार भी उनके साथ मौजूद रहे। इस्तीफे की औपचारिकता पूरी होने के बाद अब आगे की चुनावी और प्रशासनिक प्रक्रिया तेजी से पूरी की जाएगी ताकि दीपक प्रकाश के एमएलसी बनने का मार्ग प्रशस्त हो सके। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इस इस्तीफे के बाद आज ही निर्वाचन आयोग या संबंधित विभाग की ओर से इसकी आधिकारिक अधिसूचना भी जारी की जा सकती है।

वर्ष 2025 के चुनाव के बाद बिना सदन के सदस्य बने थे मंत्री, नीतीश और सम्राट सरकार में संभाल चुके हैं अहम जिम्मेदारी

गौरतलब है कि वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के पश्चात नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में दीपक प्रकाश को पहली बार मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके बाद जब राजनीतिक समीकरण बदले और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने पर नई कैबिनेट का गठन हुआ, तब भी उन्हें दोबारा मंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी। चूंकि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे, इसलिए छह महीने के भीतर उनका विधान परिषद या विधानसभा पहुंचना अनिवार्य था, और अब भाजपा के इस सियासी सहयोग के बाद उनकी कुर्सी पर मंडराता खतरा पूरी तरह टल गया है।