नई दिल्ली। भारत के लोकतंत्र का हृदय, संसद, इन दिनों मानसून सत्र के दौरान हंगामे और स्थगन की साक्षी बनी हुई है। नीट और पेपर लीक जैसे अहम मुद्दों पर जहां जंतर-मंतर पर युवाओं का प्रदर्शन जारी है, वहीं संसद के दोनों सदनों में भी इन मुद्दों पर विपक्षी दल लगातार केंद्र सरकार से जवाब मांग रहे हैं। लेकिन इस खींचतान और कार्यवाही के बार-बार बाधित होने की एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है, और वह कीमत देश के करोड़ों करदाताओं की जेब से निकलती है।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, संसद की कार्यवाही का हर एक मिनट देश को करीब ढाई लाख रुपये में पड़ता है। इस हिसाब से प्रति घंटे यह लागत डेढ़ करोड़ और एक पूरे दिन के स्थगन पर नौ करोड़ रुपये तक पहुँच जाती है। यह चौंकाने वाला आंकड़ा स्वयं इस साल के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में पीठासीन स्पीकर जगदंबिका पाल ने बताया था। यह मोटी रकम केवल सांसदों की उपस्थिति पर नहीं, बल्कि दोनों सदनों के सचिवालय, हजारों कर्मचारियों और अधिकारियों के वेतन, सुरक्षा व्यवस्था, लाइव टेलीकास्ट और आईटी सिस्टम के रखरखाव, बिजली खर्च, प्रशासनिक व्यवस्था, तकनीकी सेवाओं और अनुवाद जैसी विभिन्न मदों पर खर्च होती है।
मौजूदा मानसून सत्र के शुरुआती चार दिनों में ही कार्यवाही बाधित होने से करीब 36 करोड़ का नुकसान हो चुका है। पांचवें दिन भी कार्यवाही शुरू होते ही स्थगित की गई, जिससे प्रश्नकाल और सामान्य विधायी कामकाज प्रभावित हुआ। अगर हम 2014 से 2024 तक के आंकड़ों पर नजर डाले तब सदन की कार्यवाही में बार-बार बाधा आने से सरकारी खजाने के करीब 3300 करोड़ पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं। इससे न केवल महत्वपूर्ण विधायी और सार्वजनिक कामकाज रुकते हैं, बल्कि देश की जनता के पैसों का भी अपव्यय होता है।
सदन की कार्यवाही स्थगित करने का अधिकार लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति या पीठासीन अधिकारी के पास होता है, ताकि सदन में व्यवस्था बनी रहे। इस हंगामे के पीछे अक्सर पक्ष और विपक्ष की अपनी-अपनी दलीलें होती हैं। विपक्ष का कहना है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचती है, जांच की मांग या प्रधानमंत्री/मंत्री के बयान की उनकी मांग को अनसुना किया जाता है, जिसके चलते विरोध करना उनकी मजबूरी है। वहीं, सरकार आरोप लगाती है कि विपक्ष जानबूझकर नियमों के तहत चर्चा से बचता है और सदन की कार्यवाही बाधित करके जनता के काम में रोड़ा डालता है। जो भी हो, इस राजनीतिक खींचतान का सीधा खामियाजा देश के करदाताओं को उठाना पड़ता है, जब उनके खून-पसीने की कमाई संसद के स्थगन की भेंट चढ़ जाती है।

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