नई दिल्ली। देश भर में दुष्कर्म और पॉक्सो कानून से जुड़े संवेदनशील मामलों की त्वरित सुनवाई और जल्द न्याय दिलाने के मकसद से बनाए गए फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट खुद सुस्ती का शिकार हो रहे हैं। इन विशेष अदालतों का प्राथमिक उद्देश्य अपराध का संज्ञान लेने के एक वर्ष के भीतर सुनवाई पूरी करना था, लेकिन आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक मामलों के निपटारे की रफ्तार तय लक्ष्यों से काफी पीछे छूटती नजर आ रही है।
आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में रेप और पॉक्सो के 1.4 लाख से ज्यादा नए मामले दर्ज किए गए, लेकिन इनमें से केवल 66,500 मामलों का ही अंतिम निपटारा हो सका। इसके चलते 31 दिसंबर 2025 तक इन फास्ट-ट्रैक अदालतों में लंबित (पेंडिंग) मुकदमों की कुल संख्या बढ़कर 2.5 लाख के पार पहुंच गई है। वर्ष 2019 में जब से इन विशेष अदालतों की शुरुआत हुई है, तब से पिछले सात वर्षों में लंबित मामलों का आंकड़ा लगातार दो लाख से ऊपर ही बना हुआ है, जिससे तय समयसीमा में पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीदों को धक्का लग रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने इस योजना की मियाद को आगे बढ़ा दिया है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 790 फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों की स्थापना के लिए लागू पिछली समयसीमा को अब बढ़ाकर इस साल 30 सितंबर तक कर दिया गया है।
देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फिलहाल 775 फास्ट-ट्रैक कोर्ट संचालित हो रहे हैं, जिनमें 398 विशेष पॉक्सो अदालतें शामिल हैं। इन अदालतों के संचालन का खर्च केंद्र और राज्य सरकारें 60:40 के अनुपात में वहन करती हैं, जिसके तहत जजों, कर्मचारियों के वेतन और अदालती खर्चों का भुगतान किया जाता है। केंद्र सरकार अब तक इसके लिए 1,260 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जारी कर चुकी है। हालांकि, न्यायिक प्रक्रिया में तेजी न आ पाने का एक बड़ा कारण जजों और सपोर्ट स्टाफ के खाली पद हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि अदालतों में जजों की समय पर भर्ती करना और बुनियादी ढांचा मजबूत करना मुख्य रूप से राज्यों और संबंधित उच्च न्यायालयों की जिम्मेदारी है।

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