मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, मरीज अब AI से ले रहे इलाज की सलाह

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को लेकर पिछले कुछ दशकों में वैश्विक स्तर पर चर्चा काफी तेज हुई है। आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी, स्ट्रेस, एंग्जाइटी और डिप्रेशन के मामले अब तेजी से युवा आबादी को भी अपनी चपेट में लेते जा रहे हैं। क्या आप भी यही सोचते हैं कि दुनिया के सबसे विकसित और समृद्ध देशों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा खुश होते होंगे? अगर आपका जवाब हां है, तो एक हालिया वैश्विक रिपोर्ट आपकी इस सोच को पूरी तरह बदल सकती है।

विकसित देशों में मानसिक स्वास्थ्य की बदतर स्थिति

आधुनिक जीवनशैली, बेहतरीन आर्थिक कमाई, उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं और अत्याधुनिक तकनीक से लैस देशों में रहने के बावजूद वहां के आम नागरिक मानसिक रूप से पहले से कहीं अधिक परेशान नजर आ रहे हैं।

  • दुनिया भर के 18 देशों में मानसिक कल्याण (मेंटल वेलबीइंग) को लेकर किए गए एक विस्तृत विश्लेषण में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि पूरे यूरोप महाद्वीप में ब्रिटेन सबसे अधिक मानसिक तनाव और अवसाद झेलने वाला देश बन गया है।

  • यहां के हर तीन में से करीब एक ब्रिटिश नागरिक अपनी खराब मानसिक सेहत को लेकर गंभीर रूप से परेशान है। देश में एक बहुत बड़ी आबादी डिप्रेशन, चिंता और लंबे समय तक बने रहने वाले मानसिक तनाव जैसी जटिल समस्याओं से जूझ रही है।

विश्लेषण के मुताबिक, ब्रिटेन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे तकनीकी रूप से बेहद विकसित देश मानसिक स्वास्थ्य के मामले में सबसे निचले पायदान पर देखे गए हैं, जबकि थाईलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे देश बेहतरीन मानसिक सेहत के साथ इस सूची में सबसे ऊपर हैं। सर्वे में यह भी सामने आया कि अमेरिका इस मामले में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहा और 18 देशों की इस सूची में छठे सबसे अच्छे देश के रूप में उभरा।

सर्वे के मुख्य बिंदु और आंकड़े

यह महत्वपूर्ण विश्लेषण एक प्रमुख बीमा कंपनी 'एएक्सए' और एक स्थानीय मार्केट रिसर्च एजेंसी द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था।

  • इस सर्वे के लिए यूरोप, एशिया, उत्तरी अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के 18 अलग-अलग देशों के कुल 19,000 लोगों से सीधे बातचीत की गई, जिनमें 18 से 75 वर्ष की आयु के लोग शामिल थे।

  • सर्वे के दौरान लोगों से उनकी मानसिक स्थिति को लेकर कई सवाल पूछे गए, जिसके आधार पर हर देश को एक खास स्कोर दिया गया ताकि यह तय किया जा सके कि किस देश के नागरिकों की मानसिक सेहत सबसे बेहतर या सबसे खराब है।

रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन के लोगों को सबसे ज्यादा अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता और असुरक्षा सता रही है। करीब 50 प्रतिशत लोगों का मानना है कि दुनिया में बहुत तेजी से हो रहे बदलाव उनकी मानसिक सेहत पर बेहद नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं।

डॉक्टरों से दूरी और एआई (AI) चैटबॉट्स पर बढ़ता भरोसा

इतनी बड़ी संख्या में लोगों के मानसिक परेशानियों से घिरे होने के बावजूद, एक डरावनी सच्चाई यह सामने आई कि 60 प्रतिशत लोगों ने पिछले एक साल के दौरान किसी भी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ (थैरेपिस्ट) या डॉक्टर से पेशेवर सलाह नहीं ली। अधिकांश लोग अपनी समस्याओं के बाद भी सामाजिक डर के कारण डॉक्टर के पास जाने से बचते हैं। लगभग 25 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि उन्हें इस बात का बड़ा डर है कि यदि वे किसी मनोचिकित्सक के पास जाएंगे, तो समाज के लोग उन्हें गलत नजर से देखेंगे या उनका मजाक उड़ाएंगे।

  • एआई का बढ़ता चलन: रिपोर्ट में एक बेहद दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह उजागर हुआ कि ब्रिटेन में बड़ी संख्या में लोग मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के पास जाने के बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चैटबॉट से अपनी मानसिक समस्याओं पर सलाह ले रहे हैं।

  • सर्वे में शामिल करीब 46 प्रतिशत ब्रिटिश नागरिकों ने माना कि उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गाइडेंस के लिए एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल किया है।

  • सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि हर पांच में से दो लोगों (लगभग 40 प्रतिशत) ने यहां तक कह दिया कि मानसिक स्वास्थ्य के मामलों में उन्हें किसी पेशेवर डॉक्टर या काउंसलर से ज्यादा भरोसा एआई पर है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कड़ी चेतावनी दी है कि केवल एआई पर भरोसा करना बेहद जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि यह सही निदान करने में असमर्थ हो सकता है।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति और चुनौतियां

विकसित देशों की तरह ही भारतीय आबादी भी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के भारी दबाव से अछूती नहीं है।

  • प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में भी मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां तेजी से गंभीर रूप धारण करते हुए एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट में बदल रही हैं।

  • देश में लगभग 15% वयस्कों को मानसिक स्वास्थ्य के लिए तत्काल इलाज और देखभाल की आवश्यकता है, जिनमें डिप्रेशन और एंग्जाइटी सबसे प्रमुख समस्याएं हैं।

  • इतने बड़े स्वास्थ्य बोझ के बावजूद, भारत में इलाज न मिल पाने का अंतर (ट्रीटमेंट गैप) 80% से 85% तक बहुत ज्यादा बना हुआ है।

भारतीय समाज में आज भी मानसिक रोगों को लेकर एक प्रकार का सामाजिक कलंक (स्टिग्मा) जुड़ा हुआ है, जिसके चलते लोग खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते। इसके अलावा, देश भर में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और जरूरी संसाधनों की भारी कमी इन मुश्किलों को और अधिक बढ़ा रही है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि समाज में अनगिनत ऐसे लोग हैं जो लंबे समय से गंभीर मानसिक रोगों का शिकार हैं, लेकिन उन्हें न तो अपनी बीमारी की कोई जानकारी है और न ही उनका कोई उपचार हो पा रहा है, जो वर्तमान समय में सबसे बड़ी चिंता का विषय है।