नई दिल्ली। दिल्ली की सियासत में लंबे समय तक तीखी बहस और विवादों की वजह रहा सिविल लाइंस स्थित 6, फ्लैग स्टाफ रोड का वीवीआईपी बंगला अब नए अवतार में दिखने जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आधिकारिक निवास के रूप में चर्चित रही इस करोड़ों की संपत्ति का कायाकल्प करने की तैयारी कर ली गई है। दिल्ली सरकार इस विशाल परिसर को खाली छोड़कर सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाने के बजाय इसका व्यावसायिक इस्तेमाल कर राजस्व जुटाने की बड़ी योजना पर काम कर रही है।
आलीशान होटल चेन को मिल सकती है बंगले की बागडोर
दिल्ली का लोक निर्माण विभाग (PWD) इस बेशकीमती सरकारी संपत्ति को किसी स्थापित और बड़े लग्जरी हॉस्पिटैलिटी ब्रांड या होटल चेन को लीज पर सौंपने की तैयारी कर रहा है। विभाग का मानना है कि इस भव्य परिसर की सुरक्षा और सामान्य रख-रखाव पर हर महीने लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। यदि इसे एक सुव्यवस्थित व्यावसायिक मॉडल के तहत किसी अनुभवी प्राइवेट एजेंसी को सौंप दिया जाता है, तो रख-रखाव का सरकारी खर्च पूरी तरह खत्म हो जाएगा और बदले में सरकार को मोटी सालाना आमदनी भी होने लगेगी।
'शीश महल' के नाम से चर्चित विवादित बंगले का नया सफर
यह वही बंगला है जो आम आदमी पार्टी और विपक्ष के बीच घमासान का मुख्य मुद्दा बना रहा था। अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री रहते हुए इस बंगले में किए गए भव्य रेनोवेशन और आधुनिक साजो-सामान की खरीद पर विपक्ष ने भारी घोटाले का आरोप लगाते हुए इसे 'शीश महल' का नाम दिया था। वहीं दूसरी ओर आम आदमी पार्टी ने इसे पूरी तरह राजनीतिक प्रपंच बताया था। अब सरकार इस बंगले के राजनीतिक दाग धोने के लिए इसे एक पब्लिक-प्राइवेट हाइब्रिड मॉडल में बदलने जा रही है, जिसके तहत प्राथमिक तौर पर इस परिसर का उपयोग सरकारी बैठकों, सेमिनारों और वीआईपी कार्यक्रमों के लिए किया जाएगा और खाली दिनों में इसे शादियों व कॉर्पोरेट आयोजनों जैसी निजी बुकिंग के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।
करोड़ों की लागत से बने परिसर को काम में लाने की कवायद
इस संपत्ति के भविष्य को लेकर पीडब्ल्यूडी मंत्री प्रवेश वर्मा ने स्पष्ट किया कि दिल्ली सरकार के पास मौजूद अनुपयोगी या भारी भरकम संपत्तियों का बेहतर इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसी प्रोफेशनल एजेंसी के आने से इस पूरे परिसर का मैनेजमेंट सुधरेगा। गौरतलब है कि साल 2021-22 के दौरान इस बंगले के साथ एक भव्य कैंप ऑफिस और अतिरिक्त कमरों का निर्माण कार्य शुरू किया गया था, लेकिन विवादों और जांच के चक्रव्यूह में फंसने के बाद इसे रोक दिया गया था। उस समय इस अधूरे प्रोजेक्ट पर करीब 25 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया था। अब इस विवादित इतिहास को पीछे छोड़ते हुए सरकार इसे दिल्ली के एक नए लैंडमार्क और शानदार बिजनेस मॉडल के रूप में पेश करने की ओर कदम बढ़ा चुकी है।

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