‘मंटो’ ने दिया नया मुकाम, रसिका दुग्गल ने रिजेक्शन और ऑडिशन पर खुलकर की बात

मुंबई: लीक से हटकर और संजीदा किरदारों के दम पर बॉलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली मशहूर अभिनेत्री रसिका दुगल ने अपने फिल्मी सफर को लेकर कई दिलचस्प खुलासे किए हैं। रसिका ने खुलकर स्वीकार किया है कि उनके करियर में एक दौर ऐसा भी आया था, जब वे पूरी तरह दिशाहीन हो गई थीं और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनका भविष्य किस ओर जा रहा है। उन्होंने बताया कि जहाँ लोकप्रिय वेब सीरीज 'मिर्जापुर' ने उन्हें देश के कोने-कोने में 'बीना त्रिपाठी' के रूप में घर-घर पहचान दिलाई, वहीं उनके फिल्मी करियर को सबसे मुश्किल और निराशाजनक दौर से बाहर निकालने का असली श्रेय फिल्म 'मंटो' को जाता है। रसिका ने उन अहम किरदारों का जिक्र किया जिन्होंने न केवल उनके अभिनय को निखारा, बल्कि उनकी जिंदगी को भी पूरी तरह बदल कर रख दिया।

करियर के सबसे कठिन दौर में सहारा बनी फिल्म 'मंटो'

एक हालिया इंटरव्यू के दौरान रसिका दुगल ने अपने फिल्मी सफर के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि 'मिर्जापुर' उनके करियर का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा देखा जाने वाला प्रोजेक्ट रहा, जिसने उन्हें असीमित लोकप्रियता दी। लेकिन भावनात्मक और पेशेवर तौर पर 'मंटो' उन्हें उस समय मिली, जब उन्हें इंडस्ट्री में बने रहने के लिए एक बेहतरीन काम की सबसे ज्यादा दरकार थी।

रसिका ने उस दौर को याद करते हुए बताया कि फिल्म 'किस्सा' और 'मंटो' के बीच के समय में उन्हें लंबे अंतराल (गैप) का सामना करना पड़ा था। उस दौरान उनके हाथ में ज्यादा काम नहीं था और उन्हें बार-बार रिजेक्शन (अस्वीकार्यता) झेलनी पड़ रही थी। वह दौर मानसिक रूप से बेहद प्रताड़ित करने वाला था। रसिका अक्सर खुद से पूछती थीं कि अब यहाँ से आगे का रास्ता क्या होगा, वे काम मांगने के लिए किस निर्देशक का दरवाजा खटखटाएं और किससे मदद मांगें। ऐसे समय में 'मंटो' फिल्म ने उन्हें एक नया जीवनदान दिया और फिल्म समीक्षकों ने उन्हें एक बिल्कुल नए और गंभीर नजरिए से देखना शुरू किया।

दो दशक बाद भी ऑडिशन देने में नहीं कोई हिचक: रसिका

  • अहंकार से दूरी: फिल्म इंडस्ट्री में 20 साल से ज्यादा का लंबा वक्त बिताने के बाद भी रसिका दुगल के पैर पूरी तरह जमीन पर हैं। उन्होंने साफ कहा कि वे कभी भी ऑडिशन देने की प्रक्रिया को अपने स्तर से छोटा या नीचे नहीं समझतीं।

  • दोनों पक्षों का फायदा: रसिका के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में निर्देशकों ने उनसे ऑडिशन देने की मांग नहीं की है, लेकिन अगर आज भी कोई निर्माता-निर्देशक उनसे स्क्रीन टेस्ट देने को कहे, तो उन्हें इसमें कोई आपत्ति नहीं है। वे खुशी-खुशी ऑडिशन देंगी क्योंकि इससे निर्देशक को यह समझने में आसानी होती है कि क्या एक्टर उस रोल में फिट बैठ रहा है, और एक्टर को भी डायरेक्टर की उम्मीदों का पता चल जाता है। यह दोनों के लिए एक बेहतरीन प्रक्रिया है।

टाइपकास्ट होने से बचीं, एक साथ तीन अलग किरदारों ने बदली किस्मत

रसिका खुद को बेहद भाग्यशाली मानती हैं कि वे बॉलीवुड के उस ढर्रे (टाइपकास्टिंग) में नहीं फंसीं, जहाँ एक कलाकार को हमेशा एक ही जैसे रोल मिलने लगते हैं। अमूमन 'मिर्जापुर' जैसे बड़े शोज के कलाकारों को लोग जिंदगी भर उनके किरदारों के नाम से ही जानते हैं, लेकिन रसिका के साथ ऐसा नहीं हुआ। इसका मुख्य कारण यह था कि उनकी तीन बिल्कुल अलग जॉनर की परियोजनाएं— 'मंटो', 'मिर्जापुर' और 'दिल्ली क्राइम' लगभग एक ही समय के आसपास रिलीज हुई थीं।

जहाँ 'मिर्जापुर' में उनका किरदार बेहद बोल्ड और चतुर महिला का था, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गई सीरीज 'दिल्ली क्राइम' में उन्होंने एक बेहद ईमानदार और आदर्शवादी युवा पुलिस अफसर (नीति सिंह) का किरदार निभाया था। इन दोनों बिल्कुल विपरीत किरदारों ने फिल्म जगत को रसिका की अभिनय क्षमता की विविधता (वर्सेटैलिटी) से परिचित कराया।

शुरुआती दौर में स्टीरियोटाइप किरदारों से भी नहीं था परहेज

  • काम मिलना था प्राथमिकता: रसिका ने बेबाकी से स्वीकार किया कि करियर के शुरुआती दिनों में टाइपकास्ट होने से बचना उनकी प्राथमिकता सूची में शामिल नहीं था। उस समय उनके लिए वैरायटी दिखाने से ज्यादा जरूरी था घर चलाने के लिए काम हासिल करना।

  • करियर का शुरुआती नज़रिया: रसिका ने कहा, "शुरुआत में मैं बस यही सोचती थी कि भले ही मुझे एक ही तरह के स्टीरियोटाइप रोल मिलें, लेकिन कम से कम मुझे काम तो मिलता रहे। मैं यह चिंता करने की स्थिति में नहीं थी कि भविष्य में क्या होगा, मेरा पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ अभिनय करने पर था।"

सफलता और असफलता को दिल से न लगाने का गुरुमंत्र

ग्लेमर की दुनिया में रिजेक्शन और कामयाबी को संभालने के सवाल पर रसिका ने अपने सालों के अनुभव से सीखा हुआ एक गुरुमंत्र साझा किया। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री में रहते हुए उन्होंने यह समझ लिया है कि न तो हर रिजेक्शन को दिल से लगाकर बैठना चाहिए और न ही हर सफलता को अपने सिर पर चढ़ने देना चाहिए।

अनुभव आपको सिखाता है कि यहाँ सब कुछ केवल आपके हाथ में नहीं होता। जब चीजें आपके मुताबिक न चलें, तो उसे व्यक्तिगत हार नहीं मानना चाहिए और जब आप रातों-रात सफल हो जाएं, तो उसका पूरा श्रेय खुद नहीं लेना चाहिए क्योंकि इसमें आपकी किस्मत और पूरी टीम की मेहनत का भी बड़ा हाथ होता है। रसिका ने कहा कि उतार-चढ़ाव के समय दुख और सुख की भावनाएं आना इंसानी फितरत है, लेकिन आज वे इन दोनों ही परिस्थितियों को पहले की तुलना में कहीं अधिक परिपक्वता और सभ्य तरीके से संभालने में सक्षम हैं।