Supreme Court ने महाराष्ट्र सरकार को लगाई फटकार, बोले—’आपको जनता के सामने बेनकाब कर देंगे’

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा एक विदेशी नागरिक की जमानत याचिका का लगातार विरोध किए जाने पर तीखी नाराजगी जताई है। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने राज्य सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि प्रशासन का रवैया नहीं बदला, तो वे इसे जनता के सामने उजागर करने से पीछे नहीं हटेंगे। अदालत ने राज्य के कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे न्याय प्रक्रिया में बड़ी बाधा बताया है।

सुनवाई में देरी और प्रशासन की लापरवाही

अदालत के सामने यह तथ्य आया कि अपहरण और हत्या के आरोप में गिरफ्तार विदेशी नागरिक पिछले चार वर्षों से जेल में बंद है। आरोपी के अधिवक्ता ने जानकारी दी कि निचली अदालत में मामले की 86 बार सुनवाई की तारीख तय हुई, लेकिन पुलिस और प्रशासन की ओर से उसे 53 बार अदालत में पेश ही नहीं किया गया। इस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए इसे सरकार की घोर लापरवाही करार दिया और कहा कि आरोपियों को समय पर पेश न करना न्याय के अधिकार का उल्लंघन है।

न्याय में देरी पर कोर्ट का सख्त रुख

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के तहत नागरिकों के त्वरित न्याय पाने के अधिकार का उल्लेख करते हुए अपनी पीड़ा जाहिर की। पीठ ने बताया कि चार वर्षों की लंबी अवधि में 34 में से मात्र दो गवाहों के बयान दर्ज हो पाए हैं, जो अत्यंत चिंताजनक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार किसी जमानत याचिका का कड़ा विरोध करती है, तो यह उसकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वह मुकदमे की सुनवाई को भी बिना किसी अवरोध के तेजी से आगे बढ़ाए, जिसमें महाराष्ट्र सरकार पूरी तरह विफल रही है।

त्वरित सुनवाई के लिए कड़े निर्देश

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने भविष्य में आरोपियों को प्रत्येक सुनवाई पर पेश करने का भरोसा दिलाया। इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को मुकदमों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि इस मामले में प्रति सप्ताह कम से कम चार गवाहों के बयान दर्ज किए जाएं और इसका रिकॉर्ड निचली अदालत में पेश हो। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में भी ऐसी स्थिति दोहराई गई, तो राज्य के विरुद्ध और अधिक कठोर कदम उठाए जाएंगे।