सदर बाजार बना समंदर, कमर तक पानी में डूबा व्यापार; करोड़ों का सामान बर्बाद

नई दिल्ली। देश की राजधानी में मानसून की पहली जोरदार बारिश ने ही प्रशासनिक दावों की पोल खोलकर रख दी है। एशिया के सबसे बड़े और प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में शुमार सदर बाजार में पहली ही बरसात के बाद हालात बेहद चिंताजनक हो गए हैं। पूरे बाजार क्षेत्र में सड़कों से लेकर तंग गलियों तक जलजमाव की गंभीर स्थिति पैदा हो गई है, जिससे न केवल स्थानीय दुकानदारों बल्कि दूर-दराज से आने वाले खरीदारों को भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हर तरफ पानी और कीचड़ का साम्राज्य होने के कारण देश के इस प्रतिष्ठित बाजार की रफ्तार पूरी तरह से थम गई है।

घुटनों तक पानी और दुकानों में घुसा सीवर का कचरा

सदर बाजार के मुख्य मार्गों से लेकर अंदरूनी गलियों तक में वर्तमान समय में दो से तीन फीट तक पानी जमा हो चुका है। कई संवेदनशील संभ्रांत इलाकों में तो स्थिति इतनी बदतर है कि वहां घुटनों से लेकर कमर तक जलभराव देखा जा रहा है। सबसे ज्यादा नुकसान व्यापारियों को उठाना पड़ रहा है क्योंकि बाजार की सैकड़ों दुकानों के भीतर सीवर का गंदा पानी प्रवेश कर गया है। दुकानों के गोदामों और काउंटरों में पानी भरने की वजह से व्यापारियों का लाखों रुपये का कीमती सामान पूरी तरह भीगकर बर्बाद हो चुका है, जिससे व्यापारिक जगत में भारी निराशा है।

दावों की खुली पोल और व्यापार 80 प्रतिशत तक गिरा

मानसून के आगमन से पहले नगर निगम और तमाम संबंधित सिविक एजेंसियों द्वारा जल निकासी को लेकर बड़े-बड़े वादे किए गए थे, जो पहली ही बारिश में पूरी तरह धरे के धरे रह गए। इस भारी जलभराव और अव्यवस्था का सीधा असर यहां के मुख्य कारोबार पर पड़ा है। आवागमन पूरी तरह बाधित होने के कारण बाजार में खरीदारों की संख्या न के बराबर रह गई है, जिससे रोज का व्यापार घटकर बमुश्किल 20 प्रतिशत पर सिमट गया है। बाजार संगठन फेडरेशन ऑफ सदर बाजार ट्रेडर्स एसोसिएशन (फेस्टा) ने इस संकट को लेकर मई के महीने से ही लगातार दिल्ली सरकार और संबंधित विभागों को पत्र लिखकर चेताया था, लेकिन समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए।

हर साल का वही ढर्रा और जमीनी हकीकत से दूर प्रशासन

बाजार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने इस बदहाली पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि यह कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि हर साल मॉनसून के दौरान सदर बाजार को इसी तरह के नारकीय हालातों से गुजरना पड़ता है। प्रशासनिक अधिकारी और सरकार हर बार कागजों पर बड़ी-बड़ी योजनाएं और नाला सफाई के दावे पेश करते हैं, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी रहती है। अधिकारियों की इसी लापरवाही और इच्छाशक्ति की कमी का खामियाजा उन करदाता दुकानदारों को भुगतना पड़ रहा है, जो सालभर मेहनत कर अपनी आजीविका चलाते हैं।