बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 के आगाज के साथ ही सरकारी स्कूलों में छात्र-छात्राओं को नई यूनिफॉर्म का वितरण तेजी से किया जा रहा है। हालांकि, स्कूल ड्रेस बच्चों के हाथों में पहुंचते ही इसकी क्वालिटी को लेकर प्रदेशभर में विवाद खड़ा हो गया है। सबसे गंभीर और बड़ी आपत्ति कपड़े की गुणवत्ता को लेकर उठाई जा रही है। बिलासपुर और आसपास के कई शासकीय स्कूलों की छात्राओं और उनके अभिभावकों का साफ कहना है कि यूनिफॉर्म का कपड़ा इतना ज्यादा पतला और घटिया स्तर का है कि उसे पहनने में छात्राएं अत्यधिक असहजता और संकोच महसूस कर रही हैं।
रंग-रूप तो बदला, लेकिन क्वालिटी में आई भारी गिरावट
इस चालू शैक्षणिक सत्र से राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों की यूनिफॉर्म के पारंपरिक रंग और डिजाइन में एक बड़ा बदलाव किया है।
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नया और पुराना पैटर्न: पहले जहां छात्र-छात्राएं आसमानी रंग की शर्ट और नेवी ब्लू रंग की स्कर्ट या पैंट पहनते थे, वहीं अब हल्के नीले रंग की चेक शर्ट के साथ स्लेटी (ग्रे) रंग की स्कर्ट और पैंट अनिवार्य की गई है।
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ट्रायल के बाद भी लापरवाही: प्रशासन का दावा था कि इस बदलाव का उद्देश्य सरकारी स्कूल के बच्चों को कॉन्वेंट की तर्ज पर एक आधुनिक और आकर्षक लुक देना है, जिसके लिए पहले बिलासपुर और अंबिकापुर के चुनिंदा स्कूलों में बाकायदा ट्रायल भी रन किया गया था। लेकिन जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर सप्लाई होते ही नई यूनिफॉर्म के कपड़े की क्वालिटी पर गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं।
साइज की गड़बड़ी से भी परेशान हो रहे स्कूली बच्चे
कपड़े के पतलेपन के अलावा, हर साल की तरह इस बार भी यूनिफॉर्म के साइज को लेकर स्कूलों में भारी अव्यवस्था देखने को मिल रही है। अभिभावकों की शिकायत है कि कई स्कूलों में बच्चों का सही शारीरिक माप (मेजरमेंट) लिए बिना ही पुराने ढर्रे पर तैयार रेडीमेड कपड़े सीधे भेज दिए गए। इसका नतीजा यह हुआ कि अधिकांश विद्यार्थियों के लिए पैंट, शर्ट और स्कर्ट का साइज पूरी तरह अनुपयुक्त और अनफिट साबित हो रहा है, जिसे ठीक कराने के लिए अभिभावकों को अपनी जेब से दर्जी को पैसे देने पड़ रहे हैं।
156 करोड़ का भारी-भरकम बजट, फिर भी ऐसी बदहाली?
शिक्षा विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए राज्य सरकार ने यूनिफॉर्म योजना के तहत लगभग 156 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि स्वीकृत की है। इस भारी बजट से पूरे प्रदेश के लिए करीब 59 लाख यूनिफॉर्म सेट तैयार करवाए गए हैं। नियम के अनुसार, कक्षा पहली से लेकर आठवीं तक के प्रत्येक सरकारी छात्र-छात्रा को दो-दो सेट निशुल्क ड्रेस उपलब्ध कराने का कड़ा प्रावधान है।
वर्तमान स्थिति की बात करें तो सरगुजा, बिलासपुर और बस्तर संभाग के अधिकांश ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में विद्यार्थियों को दोनों सेट वितरित किए जा चुके हैं। इसके विपरीत, रायपुर और दुर्ग संभाग के कई अंदरूनी स्कूलों में फिलहाल बच्चों को केवल एक ही सेट मिल पाया है। हालांकि, स्कूल शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों ने दावा किया है कि आगामी 15 जुलाई तक राज्य के सभी पात्र और नामांकित विद्यार्थियों को दोनों सेट अनिवार्य रूप से बांट दिए जाएंगे।
विभाग ने दी सफाई, खराब यूनिफॉर्म बदली जाएगी
यूनिफॉर्म की घटिया क्वालिटी को लेकर बढ़ते जन-आक्रोश के बाद स्कूल शिक्षा विभाग बैकफुट पर नजर आ रहा है। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने सफाई देते हुए भरोसा दिलाया है कि जिन भी विकासखंडों या स्कूलों से कपड़ों की खराब गुणवत्ता को लेकर शिकायतें लिखित में प्राप्त होंगी, वहां तत्काल प्रभाव से जांच टीम भेजी जाएगी। जांच में दोषी पाए जाने वाले सप्लायर्स और ठेकेदारों पर कार्रवाई की जाएगी और खराब यूनिफॉर्म को वापस लेकर उनके स्थान पर नए और बेहतर कपड़े रिप्लेस करके दिए जाएंगे। विभाग ने इसके लिए प्राचार्यों और अभिभावकों से सीधे शिकायत दर्ज कराने की अपील की है।
स्कूलों में मंत्रोच्चार के अनिवार्य आदेश पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
इसी बीच, छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों की आंतरिक गतिविधियों से जुड़ा एक और बड़ा मामला देश के कानूनी गलियारे तक पहुंच गया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शासकीय स्कूलों में प्रतिदिन सुबह की प्रार्थना के दौरान मंत्रोच्चार अनिवार्य रूप से शुरू करने के सरकारी आदेश को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज कर दिया है।
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याचिकाकर्ता की दलील: याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने दलील दी थी कि सरकारी शिक्षण संस्थानों में किसी विशेष धार्मिक मंत्रोच्चार को अनिवार्य करना भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) सिद्धांतों और मौलिक अधिकारों के पूरी तरह खिलाफ है, इसलिए इस प्रशासनिक आदेश को तुरंत रद्द किया जाना चाहिए।
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हाईकोर्ट की टिप्पणी: मामले की अंतिम सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के महाधिवक्ता ने अदालत को साफ तौर पर आश्वस्त किया कि फिलहाल प्रदेश के किसी भी सरकारी स्कूल में इस आदेश का जमीनी स्तर पर पालन शुरू नहीं कराया गया है और न ही किसी पर दबाव बनाया जा रहा है। सरकार के इस पक्ष को रिकॉर्ड पर लेते हुए हाईकोर्ट की डबल बेंच ने कहा कि चूंकि वर्तमान में इस आदेश से कोई व्यावहारिक नुकसान नहीं हुआ है, इसलिए इस याचिका को अभी खारिज किया जाता है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में कहीं भी इस आदेश के कारण किसी विद्यार्थी या प्रभावित पक्ष को परेशानी होती है, तो वे दोबारा नई याचिका के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

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